अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपनी सख्त और आक्रामक नीति को और तेज कर दिया है। सोमवार को ट्रंप ने डेनमार्क पर आरोप लगाया कि वह पिछले दो दशकों से ग्रीनलैंड को लेकर रूस से उत्पन्न सुरक्षा खतरे को गंभीरता से नहीं ले पाया, जबकि नाटो लगातार इस बारे में चेतावनी देता रहा है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि अब इंतजार का दौर खत्म हो चुका है और “अब कार्रवाई का समय आ गया है।”
अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने लिखा कि नाटो बीते 20 वर्षों से डेनमार्क को यह कहता आ रहा है कि ग्रीनलैंड से रूसी प्रभाव को दूर करना जरूरी है, लेकिन डेनमार्क इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने में विफल रहा। ट्रंप ने कहा कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि निर्णायक कदम उठाना अनिवार्य हो गया है और यह किया जाएगा।
ग्रीनलैंड विवाद के साथ यूरोप पर टैरिफ की धमकी
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और उसके कई यूरोपीय सहयोगियों के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में घोषणा की कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण के विरोध को देखते हुए यूरोपीय देशों से आयात होने वाले सामानों पर भारी टैरिफ लगाए जाएंगे।
ट्रंप के अनुसार, फरवरी से डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड से आने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि 1 जून तक ग्रीनलैंड के “पूर्ण और संपूर्ण अधिग्रहण” को लेकर कोई समझौता नहीं हुआ, तो यह टैरिफ बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाएगा।
टैरिफ को बताया दबाव की रणनीति
राष्ट्रपति ट्रंप ने इन टैरिफ को एक रणनीतिक उपकरण के रूप में पेश किया है। उनका कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है और वहां रूस या चीन जैसी ताकतों का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका डेनमार्क और अन्य संबंधित देशों के साथ बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन यह बातचीत अमेरिकी सुरक्षा हितों को ध्यान में रखकर होनी चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका ने दशकों तक अपने सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित की है और अब जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नाटो और ट्रांसअटलांटिक रिश्तों पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम नाटो और अमेरिका-यूरोप संबंधों में नई तनातनी पैदा कर सकता है। नाटो 1949 से यूरोप और उत्तरी अमेरिका की सामूहिक सुरक्षा की रीढ़ रहा है, लेकिन ट्रंप लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि कई सदस्य देश रक्षा के मामले में अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे।
ट्रंप ने पहले भी कई मौकों पर सहयोगी देशों पर दबाव बनाने के लिए व्यापारिक प्रतिबंधों और टैरिफ का सहारा लिया है। उनका मानना है कि आर्थिक दबाव सैन्य टकराव की तुलना में अधिक प्रभावी और कम जोखिम भरा विकल्प हो सकता है।
डेनमार्क की प्रतिक्रिया
डेनमार्क ने ट्रंप की टैरिफ धमकी पर हैरानी जताई है। डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन ने कहा कि यह घोषणा अप्रत्याशित थी, खासकर तब जब कुछ ही दिन पहले वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों के साथ उनकी बातचीत सकारात्मक और रचनात्मक रही थी।
डेनमार्क का कहना है कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा उसकी जिम्मेदारी है और वह इस क्षेत्र को लेकर अपने दायित्वों को गंभीरता से निभा रहा है।
यूरोपीय नेताओं की कड़ी प्रतिक्रिया
अन्य यूरोपीय देशों ने भी ट्रंप की इस योजना का विरोध किया है। कई नेताओं ने चेतावनी दी है कि इस तरह के एकतरफा टैरिफ कदम ट्रांसअटलांटिक संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और सहयोगी देशों के बीच विश्वास कमजोर कर सकते हैं। यूरोपीय संघ के भीतर यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि अमेरिका टैरिफ लागू करता है, तो जवाबी कदम उठाए जाएं।
ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व
ग्रीनलैंड लंबे समय से राष्ट्रपति ट्रंप के एजेंडे में रहा है। यह खनिज संसाधनों से भरपूर द्वीप है, जहां लगभग 57,000 लोग रहते हैं। इसकी भौगोलिक स्थिति आर्कटिक क्षेत्र में बेहद अहम मानी जाती है, क्योंकि यह प्रमुख समुद्री मार्गों और सैन्य निगरानी क्षेत्रों के पास स्थित है।
ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है और इसकी रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क सरकार के पास है। हालांकि, अमेरिका की वहां पहले से सैन्य मौजूदगी है।
अमेरिका की सैन्य मौजूदगी पहले से कायम
1951 में हुए एक रक्षा समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड तक सैन्य पहुंच प्राप्त है। वहां स्थित पिटुफिक स्पेस बेस अमेरिका और नाटो के लिए मिसाइल चेतावनी, मिसाइल रक्षा और अंतरिक्ष निगरानी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसके बावजूद ट्रंप का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और अमेरिका को ग्रीनलैंड पर अधिक नियंत्रण हासिल करना चाहिए।
रूस और चीन को लेकर ट्रंप की चिंता
राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार यह चेतावनी देते रहे हैं कि रूस और चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करने की कोशिश कर सकते हैं। उनके अनुसार, यदि अमेरिका ने समय रहते निर्णायक कदम नहीं उठाए, तो यह क्षेत्र पश्चिमी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
ट्रंप ने साफ कहा है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण से कम कोई भी विकल्प उन्हें स्वीकार नहीं है।
सैन्य कार्रवाई के बजाय आर्थिक दबाव
ट्रंप ने संकेत दिया है कि रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सैन्य बल के बजाय आर्थिक दबाव अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है। उन्होंने अतीत के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि कैसे व्यापारिक धमकियों के जरिए देशों को बातचीत की मेज पर लाया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का यह रुख आने वाले समय में अमेरिका-यूरोप संबंधों को नई दिशा दे सकता है। यह देखना अहम होगा कि डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देश किसी समझौते की ओर बढ़ते हैं या यह विवाद और गहराता है।
फिलहाल, इतना स्पष्ट है कि ग्रीनलैंड अब केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन और वैश्विक राजनीति का बड़ा केंद्र बन चुका है।