साक़िब़ सिद्दीकी का सरकार से सीधा सवाल: “बराबरी के नाम पर भेदभाव क्यों?”

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता साक़िब़ सिद्दीकी ने धार्मिक आयोजनों को लेकर राज्य सरकार पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया, कहा — "कुंभ में फूल बरसाना गर्व, ईद-ए-मिलाद पर बोझ क्यों?"

Vin News Network
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शराब बिक्री और नॉन-वेज दुकानों पर दोहरे रवैये का मुद्दा
Highlights
  • सरकार पर धार्मिक आयोजनों में भेदभाव का आरोप
  • सवाल — “कुंभ में फूल बरसाना सम्मान, ईद पर क्यों आपत्ति?”
  • शराब बिक्री और नॉन-वेज दुकानों पर दोहरे रवैये का मुद्दा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक आयोजनों और सरकारी नीतियों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता साक़िब़ सिद्दीकी ने गुरुवार को राज्य सरकार पर दोहरे रवैये का आरोप लगाते हुए तीखे सवाल खड़े किए। सिद्दीकी का कहना है कि सरकार “सबका साथ, सबका विकास” की बात तो करती है, लेकिन धार्मिक आयोजनों के मामले में उसका रुख पूरी तरह भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा: “कुंभ में फूल बरसाना गर्व की बात है, तो ईद-ए-मिलाद के जुलूस पर फूल बरसाना बोझ क्यों माना जाता है?”

धार्मिक आयोजनों में भेदभाव का आरोप
सिद्दीकी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि धार्मिक आयोजनों में बराबरी की नीति का पालन नहीं किया जा रहा। “सरकार जब कुंभ के दौरान करोड़ों रुपये खर्च करके भव्य इंतज़ाम करती है, फूल बरसाती है और उसे गर्व की बात मानती है, तो फिर ईद-ए-मिलाद के जुलूस पर फूल बरसाने पर आपत्ति क्यों? क्या एक त्योहार का सम्मान और दूसरे का अनदेखा करना ही सरकार की नीति है?” उन्होंने कहा कि इस तरह का रवैया सामाजिक सौहार्द और धार्मिक एकता के लिए खतरनाक है।

शराब बिक्री और नॉन-वेज दुकानों पर सवाल
साक़िब़ सिद्दीकी ने सरकार की नीतियों को दोहरे मानदंड बताते हुए कहा कि सावन के महीने में प्रशासन पूरे राज्य में ज़बरदस्ती नॉन-वेज की दुकानें बंद करवाता है। “सावन भर नॉन-वेज की दुकानों पर ताले लगवाना सरकार के लिए गर्व की बात है, लेकिन ईद-ए-मिलाद के सिर्फ एक दिन शराब की बिक्री बंद करना भी सरकार को गवारा नहीं। आखिर ये कैसी बराबरी है?” उनका कहना था कि धार्मिक भावनाओं का सम्मान सिर्फ एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए समान होना चाहिए। “कुर्सी नफ़रत की नहीं, सबका हक़ देने की होनी चाहिए” सिद्दीकी ने अपने बयान में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा: “जो कुर्सी सबका हक़ न दे, वह कुर्सी जनता की नहीं, बल्कि नफ़रत की निशानी बन जाती है।” उन्होंने सरकार से मांग की कि धार्मिक आयोजनों में बराबरी की नीति अपनाई जाए और किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव न हो।

प्रदेश की सियासत में नई बहस
साक़िब़ सिद्दीकी के इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है बीजेपी सरकार के प्रवक्ताओं का कहना है कि सरकार किसी के साथ भेदभाव नहीं करती, जबकि समाजवादी पार्टी ने इसे “सरकार का दोहरा चेहरा” बताया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद धार्मिक संवेदनशीलता से जुड़ा होने के कारण आने वाले दिनों में और ज्यादा तूल पकड़ सकता है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा बयान
सिद्दीकी का यह बयान सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रहा है। लोग इस पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं — कुछ लोग इसे धार्मिक समानता की मांग बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे सियासी बयानबाज़ी मान रहे हैं। ट्विटर और फेसबुक पर #SaqibVsGovt और #ReligiousEquality जैसे हैशटैग्स ट्रेंड करने लगे हैं।

विपक्ष का समर्थन और सत्ता पक्ष की चुप्पी
समाजवादी पार्टी के अन्य नेताओं ने भी सिद्दीकी के बयान का समर्थन किया है। पार्टी का कहना है कि सरकार को सबके लिए एक जैसी नीतियां अपनानी चाहिए और धार्मिक आयोजनों में भेदभाव नहीं होना चाहिए। वहीं, बीजेपी की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं ने ऑफ़ द रिकॉर्ड इसे “बेवजह का विवाद” बताया।

जनता की प्रतिक्रिया
लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और अयोध्या जैसे शहरों में लोग इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं। कई मुस्लिम संगठनों ने सिद्दीकी के बयान का समर्थन किया, जबकि कुछ हिंदू संगठनों ने इसे “धार्मिक राजनीति” करार दिया। साक़िब़ सिद्दीकी के बयान ने प्रदेश की सियासत में नया मोड़ ला दिया है धार्मिक आयोजनों में सरकारी नीतियों की बराबरी का सवाल अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में सरकार पर समानता की दिशा में कदम उठाने का दबाव बढ़ सकता है।

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