उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी जहां सत्ता बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे वापसी की उम्मीद लगाए हुए है। इसी बीच एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने यूपी की राजनीति में बड़ा दांव खेलने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, AIMIM इस बार करीब 200 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना बना रही है।
2022 से दोगुनी तैयारी के साथ मैदान में उतरेगी AIMIM
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने उत्तर प्रदेश की 95 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। हालांकि पार्टी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली और उसका वोट शेयर लगभग 0.45 प्रतिशत तक सीमित रहा। उस चुनाव में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को रोकने के उद्देश्य से समाजवादी पार्टी का समर्थन किया था। अब 2027 के चुनाव से पहले ओवैसी पिछली रणनीति में बदलाव करते हुए अधिक व्यापक स्तर पर चुनावी तैयारी कर रहे हैं।
बिहार मॉडल पर फोकस, दलित-मुस्लिम समीकरण साधने की कोशिश
बताया जा रहा है कि इस बार एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश में बिहार मॉडल की तर्ज पर चुनावी रणनीति अपनाने की तैयारी कर रही है। पार्टी केवल मुस्लिम बहुल सीटों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दलित और मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल के अलावा कई नई सीटों पर भी संगठन को सक्रिय किया जा रहा है।
रैलियों के जरिए संगठन को मजबूत करने में जुटे ओवैसी
असदुद्दीन ओवैसी ने बहराइच, बिजनौर और नजीबाबाद जैसे इलाकों से चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी है। पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। अपने भाषणों में ओवैसी लगातार यह मुद्दा उठा रहे हैं कि मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया जाता है और उन्हें पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।
क्या सपा के ‘पीडीए’ और ‘MY’ समीकरण पर पड़ेगा असर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एआईएमआईएम बड़ी संख्या में सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारती है, तो इसका असर समाजवादी पार्टी के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक पर पड़ सकता है। विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मुरादाबाद और बरेली मंडल जैसी सीटों पर, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, वहां वोटों का बंटवारा चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। ऐसी स्थिति में भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना भी जताई जा रही है।
सपा के सामने बड़ी चुनौती
समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक समर्थकों का भरोसा बनाए रखना होगी। पार्टी को यह संदेश देना होगा कि विपक्षी वोटों का बंटवारा उसके चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, ओवैसी मुस्लिम युवाओं और नए मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अलग राजनीतिक विकल्प का संदेश दे रहे हैं।
2027 का चुनाव हो सकता है और दिलचस्प
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में एआईएमआईएम की सक्रियता राज्य की चुनावी तस्वीर को नया मोड़ दे सकती है। यदि पार्टी वास्तव में 200 सीटों पर चुनाव लड़ती है, तो कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ओवैसी की रणनीति उत्तर प्रदेश की राजनीति में कितना असर छोड़ पाती है और इसका सबसे अधिक प्रभाव किस दल पर पड़ता है।