विन न्यूज़ नेटवर्क। मानसून के मौसम में मच्छरों से होने वाली बीमारियों के साथ-साथ दूषित पानी और संक्रमित भोजन से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। इन्हीं में से एक है टाइफाइड, जिसे कई लोग सामान्य बुखार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय रहते इसका इलाज शुरू न किया जाए तो यह संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है और कई अंगों को प्रभावित कर सकता है।
इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक और अध्यक्ष अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए बताया कि उनकी मेडिकल जांच में टाइफाइड की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है और उन्हें सुबह-शाम इंट्रावेनस (IV) थेरेपी के जरिए दवाएं दी जा रही हैं। इसके बाद एक बार फिर टाइफाइड को लेकर लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई है।
क्या होता है टाइफाइड?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, टाइफाइड एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो Salmonella Typhi नामक बैक्टीरिया से होता है। यह बैक्टीरिया मुख्य रूप से दूषित पानी या संक्रमित भोजन के जरिए शरीर में प्रवेश करता है। संक्रमण होने के बाद बैक्टीरिया रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुंच जाता है और धीरे-धीरे बीमारी गंभीर होने लगती है।
वैश्विक स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, हर साल दुनिया भर में लाखों लोग टाइफाइड की चपेट में आते हैं। दक्षिण एशिया उन क्षेत्रों में शामिल है, जहां इसके मामले अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किए जाते हैं।
कैसे फैलता है संक्रमण?
टाइफाइड मुख्य रूप से स्वच्छता की कमी और दूषित खाद्य पदार्थों के कारण फैलता है। यदि कोई व्यक्ति संक्रमित पानी पीता है या ऐसा भोजन करता है जो संक्रमित हाथों से तैयार किया गया हो, तो बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बरसात के मौसम में जल स्रोतों के दूषित होने और खुले खाद्य पदार्थों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि मानसून में टाइफाइड के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिलती है।
इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
टाइफाइड के शुरुआती लक्षण संक्रमण के लगभग 10 से 14 दिन बाद दिखाई दे सकते हैं। शुरुआत में मरीज को लगातार बढ़ता हुआ बुखार महसूस होता है। इसके अलावा कई अन्य संकेत भी दिखाई दे सकते हैं। मुख्य लक्षणों में शामिल हैं-
- लगातार तेज बुखार
- सिरदर्द और कमजोरी
- अत्यधिक थकान
- पेट दर्द
- भूख कम लगना
- मतली और उल्टी
- कब्ज या दस्त
- मांसपेशियों में दर्द
- शरीर पर लाल रंग के छोटे दाने (रैशेज)
यदि लंबे समय तक बुखार बना रहे या मरीज की स्थिति बिगड़ने लगे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
समय पर इलाज न मिले तो हो सकती हैं गंभीर परेशानियां
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इलाज में देरी होने पर टाइफाइड कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। संक्रमण बढ़ने पर आंतों में छेद या ब्लीडिंग, शरीर में पानी की गंभीर कमी, निमोनिया, किडनी से जुड़ी समस्याएं, मस्तिष्क में संक्रमण, अग्न्याशय (पैंक्रियाज) में सूजन और अन्य अंगों पर असर पड़ सकता है।
इसी वजह से डॉक्टर सलाह देते हैं कि लंबे समय तक तेज बुखार रहने पर स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए।
टाइफाइड में IV थेरेपी की जरूरत क्यों पड़ती है?
गंभीर संक्रमण की स्थिति में मरीज के शरीर में पानी और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है। ऐसे मामलों में डॉक्टर इंट्रावेनस (IV) फ्लूइड और दवाएं देते हैं, जिससे दवा सीधे रक्त में पहुंचती है और तेजी से असर करती है।
यदि मरीज लगातार उल्टी कर रहा हो, डिहाइड्रेशन हो या सामान्य दवाएं असर न कर रही हों, तो अस्पताल में भर्ती कर IV उपचार दिया जा सकता है।
कैसे होती है बीमारी की पहचान?
टाइफाइड की पुष्टि केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जाती। डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार विभिन्न जांच कराने की सलाह देते हैं। इनमें प्रमुख हैं-
- ब्लड टेस्ट
- ब्लड कल्चर
- विडाल टेस्ट
- टाइफी डॉट टेस्ट
- स्टूल और यूरिन टेस्ट
कुछ जटिल मामलों में बोन मैरो कल्चर भी कराया जा सकता है, जिससे संक्रमण की सटीक पहचान हो सके।
इन उपायों से काफी हद तक किया जा सकता है बचाव
विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी सावधानी बरतकर टाइफाइड से बचा जा सकता है। इसके लिए हमेशा साफ और उबला या फिल्टर किया हुआ पानी पीना चाहिए। भोजन ताजा और अच्छी तरह पका हुआ होना चाहिए। खाने से पहले और शौचालय के बाद साबुन से हाथ धोने की आदत संक्रमण के खतरे को काफी कम करती है।
इसके अलावा सड़क किनारे खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थों से बचना, घर और आसपास साफ-सफाई रखना तथा जोखिम वाले क्षेत्रों में जाने से पहले डॉक्टर की सलाह पर टाइफाइड वैक्सीन लगवाना भी उपयोगी माना जाता है।