सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर 20 नवंबर को दिए गए अपने पूर्व आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है और पूरे मुद्दे की दोबारा, विशेषज्ञों के नेतृत्व में समीक्षा कराने का फैसला किया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और वैज्ञानिक आकलन नहीं हो जाता, तब तक न तो नवंबर के फैसले को लागू किया जाएगा और न ही सरकार द्वारा गठित समिति की सिफारिशों को प्रभाव में लाया जाएगा। अदालत ने कहा कि अरावली जैसे संवेदनशील और व्यापक पर्यावरणीय महत्व वाले क्षेत्र के लिए किसी भी अंतिम निर्णय से पहले गहराई से अध्ययन आवश्यक है।
यह मामला “इन री: डेफिनिशन ऑफ अरावली हिल्स एंड रेंजेज एंड एंसीलरी इश्यूज” शीर्षक से तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष सुना गया, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत कर रहे थे। उनके साथ जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह भी पीठ में शामिल थे। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि नई परिभाषा के तहत खनन पूरी तरह रोका जाएगा या कुछ शर्तों के साथ जारी रहने दिया जाएगा, और इसके पीछे सरकार का तर्क क्या है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नवंबर में दिए गए आदेश और समिति की रिपोर्ट को लेकर कई तरह की गलत व्याख्याएं सामने आ रही हैं, जिससे भ्रम की स्थिति बन गई है। अदालत ने टिप्पणी की कि किसी भी रिपोर्ट या न्यायिक निर्देश को लागू करने से पहले स्वतंत्र विशेषज्ञों की राय को गंभीरता से सुनना जरूरी है। इसी आधार पर अदालत ने एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें पर्यावरण, भूविज्ञान और वन संरक्षण से जुड़े डोमेन एक्सपर्ट्स शामिल होंगे। इस प्रक्रिया में सार्वजनिक परामर्श को भी शामिल किया जाएगा।
अदालत ने नई समिति के लिए पांच अहम सवाल तय किए हैं। इनमें यह जांच शामिल है कि क्या अरावली की परिभाषा को केवल 500 मीटर के दायरे तक सीमित करने से संरक्षण क्षेत्र सिकुड़ जाता है और इससे कोई संरचनात्मक विरोधाभास पैदा होता है। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि क्या इस नई परिभाषा के चलते गैर-अरावली क्षेत्रों में नियंत्रित खनन की गुंजाइश अनजाने में बढ़ जाती है। अदालत यह भी जानना चाहती है कि उन इलाकों में खनन की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, जहां 100 मीटर से ऊंची दो पहाड़ियां लगभग 700 मीटर की दूरी पर स्थित हैं, और ऐसे “गैप्स” को कैसे परिभाषित किया जाए। इसके साथ ही पारिस्थितिक निरंतरता बनाए रखने के लिए किन संरचनात्मक मानकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए और यदि किसी तरह की नियामक खामी सामने आती है तो क्या व्यापक प्रभाव आकलन जरूरी होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी संबंधित राज्यों को नोटिस जारी करते हुए कहा कि 20 नवंबर का आदेश और सरकार की समिति की सिफारिशें नई समिति के गठन तक स्थगित रहेंगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अंतरिम रोक तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक नई विशेषज्ञ समिति अपना काम शुरू नहीं कर देती। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को तय की गई है।
उल्लेखनीय है कि नवंबर में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित अरावली की मानकीकृत परिभाषा को स्वीकार किया था। उस ढांचे के तहत किसी भू-आकृति को तभी “अरावली पहाड़ी” माना जाना था, जब वह आसपास के क्षेत्र से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो। वहीं “रेंज” की परिभाषा के लिए जरूरी था कि ऐसी दो पहाड़ियां एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों। वन सर्वेक्षण रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, अरावली क्षेत्र में मौजूद 12 हजार से अधिक पहाड़ी संरचनाओं में से केवल करीब 8.7 प्रतिशत ही इस 100 मीटर की कसौटी पर खरी उतरती हैं। इसी वजह से पर्यावरणविदों ने आरोप लगाया कि इस परिभाषा से अरावली के 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र की कानूनी सुरक्षा खत्म हो सकती है और खनन गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है।
अरावली पर्वतमाला को उत्तर भारत के लिए एक “ग्रीन वॉल” माना जाता है, जो थार मरुस्थल के पूर्व की ओर फैलाव को रोकती है। यह क्षेत्र राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल रिचार्ज के लिए भी बेहद अहम है। बढ़ते विवाद के बीच केंद्र सरकार ने हाल ही में संबंधित राज्यों को निर्देश दिया था कि पूरे अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
इस बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय अरावली के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए हरसंभव सहयोग देने को तैयार है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल नई खनन लीज या पुरानी लीज के नवीनीकरण पर पूरी तरह रोक बनी हुई है। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह कदम अरावली संरक्षण को लेकर एक संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।