विन न्यूज़ नेटवर्क। आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, नौकरी, बैंकिंग, मनोरंजन और सोशल मीडिया से लेकर हर जरूरी काम अब मोबाइल के जरिए ही पूरा होने लगा है। हालांकि, तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। न्यूरोलॉजिस्ट का कहना है कि लगातार स्क्रीन पर समय बिताने की आदत युवाओं में ऐसी समस्याएं बढ़ा रही है, जिन्हें अब “स्मार्टफोन ब्रेन” या “डिजिटल ब्रेन फटीग” जैसे नामों से समझाया जा रहा है।
पहले जहां न्यूरोलॉजी विभाग में अधिकतर बुजुर्ग मरीज स्ट्रोक, पार्किंसन या डिमेंशिया जैसी बीमारियों के कारण पहुंचते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में युवा और किशोर भी लगातार सिरदर्द, भूलने की आदत, ध्यान केंद्रित न कर पाना, नींद की कमी और मानसिक थकान जैसी शिकायतों के साथ डॉक्टरों से संपर्क कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन समस्याओं के पीछे अत्यधिक स्क्रीन टाइम एक बड़ा कारण बनता जा रहा है।
हर समय सक्रिय रहता है दिमाग
विशेषज्ञों के अनुसार, स्मार्टफोन पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया की अनंत स्क्रॉलिंग और बार-बार अलग-अलग ऐप्स पर जाना दिमाग को हर समय नई जानकारी और उत्तेजना देता रहता है। इससे मस्तिष्क को लगातार सक्रिय रहने की आदत पड़ जाती है। नतीजतन, किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान लगाना मुश्किल होने लगता है। यही वजह है कि कई लोग पढ़ाई, ऑफिस मीटिंग या किताब पढ़ते समय भी बार-बार मोबाइल देखने लगते हैं।
नींद और याददाश्त पर पड़ रहा असर
डॉक्टरों का कहना है कि देर रात तक मोबाइल इस्तेमाल करने से स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के निर्माण को प्रभावित करती है। यही हार्मोन हमारी नींद के प्राकृतिक चक्र को नियंत्रित करता है। जब पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद नहीं मिलती तो दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। इससे याददाश्त कमजोर होना, नई जानकारी याद रखने में परेशानी और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं सामने आने लगती हैं। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर तनाव, चिंता और अवसाद का खतरा भी बढ़ सकता है।
‘टेक्स्ट नेक’ और डिजिटल थकान भी बड़ी समस्या
लंबे समय तक गर्दन झुकाकर मोबाइल देखने से गर्दन, कंधे और रीढ़ की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस समस्या को मेडिकल भाषा में “टेक्स्ट नेक” कहा जाता है। इसके कारण टेंशन हेडेक, माइग्रेन और गर्दन में लगातार दर्द की शिकायत बढ़ सकती है। वहीं लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर भी दबाव पड़ता है, जिससे डिजिटल आई स्ट्रेन और मानसिक थकान महसूस होने लगती है। कई लोगों में चिड़चिड़ापन, काम में रुचि कम होना और मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करना भी आम होता जा रहा है।
बच्चों और किशोरों पर ज्यादा खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों और किशोरों का मस्तिष्क अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। ऐसे में जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके मानसिक विकास, पढ़ाई, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक असर डाल सकता है। लगातार मोबाइल इस्तेमाल करने वाले बच्चों में ध्यान की कमी, पढ़ाई में गिरावट और व्यवहार संबंधी बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं।
स्मार्टफोन नहीं, गलत आदत है असली समस्या
स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह साफ करते हैं कि समस्या स्मार्टफोन नहीं, बल्कि उसका अनियंत्रित और गलत इस्तेमाल है। यदि मोबाइल का उपयोग संतुलित तरीके से किया जाए तो इसके नुकसान काफी हद तक कम किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञ 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए लगभग 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें। इसके अलावा स्क्रीन से नियमित ब्रेक लें, सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद करें, सही मुद्रा में बैठकर फोन चलाएं, नियमित व्यायाम करें और रोज कुछ समय खुले वातावरण में बिताएं। इससे आंखों और दिमाग दोनों को आराम मिलता है तथा डिजिटल थकान का खतरा कम हो सकता है।
यह जानकारी विभिन्न शोध, मेडिकल विशेषज्ञों की राय और उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्टों पर आधारित है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। यदि आपको लगातार सिरदर्द, याददाश्त में कमी, नींद की समस्या या अन्य मानसिक लक्षण महसूस हों तो किसी योग्य डॉक्टर या न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह अवश्य लें।