पराली की आग से सुलग रहा पंजाब, 2,347 मामले दर्ज, प्रशासन ने लगाया 40.37 लाख का जुर्माना

Vin News Network
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पराली जलाने के मामलों में तरनतारन जिला सबसे आगे चल रहा है।

विन न्यूज़ नेटवर्क। सर्दियों की आहट के साथ उत्तर भारत की हवा पर प्रदूषण का दबाव बढ़ने लगा है। इसकी बड़ी वजह पंजाब में धान की फसल कटने के बाद खेतों में जलाई जा रही पराली भी है। राज्य में इस सीजन में अब तक 2,347 स्थानों पर पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।

4 नवंबर को ही 151 नए मामले सामने आए। लगातार सामने आ रहे ये आंकड़े प्रशासन की चिंता बढ़ा रहे हैं, क्योंकि कार्रवाई के बावजूद खेतों में आग लगाने की घटनाएं थम नहीं रही हैं।

तरनतारन में सबसे ज्यादा आग की घटनाएं

पराली जलाने के मामलों में तरनतारन जिला सबसे आगे चल रहा है। यहां 558 घटनाएं दर्ज की गई हैं। दूसरे स्थान पर फिरोजपुर है, जहां 316 मामले सामने आए हैं। अमृतसर में भी 207 जगहों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई है। इन जिलों में लगातार हो रही घटनाओं के कारण पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है। खासकर धान की कटाई के मौसम में इन इलाकों पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

जुर्माने के साथ कानूनी शिकंजा भी कसा

खेतों में आग लगाने वालों के खिलाफ प्रशासन ने कई स्तरों पर कार्रवाई की है। अब तक कुल 40.37 लाख रुपये का पर्यावरण मुआवजा निर्धारित किया गया है, जबकि 23.50 लाख रुपये की वसूली हो चुकी है। इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता के तहत 647 एफआईआर दर्ज की गई हैं। प्रशासन ने कृषि भूमि के सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में 723 रेड एंट्री भी दर्ज की हैं। इसके बावजूद घटनाओं की संख्या में लगातार इजाफा होना कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहा है।

पंजाब से दिल्ली तक प्रदूषण का खतरा

पराली के धुएं का असर सीमाओं में बंधा नहीं रहता। हवा की दिशा और मौसम की परिस्थितियों के अनुसार इसका प्रभाव दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। पंजाब में खेतों से उठने वाला धुआं दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कई कारकों में शामिल है। दिल्ली के साथ नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम जैसे शहर भी पहले से प्रदूषण की चुनौती का सामना कर रहे हैं।

आखिर क्यों जलाई जाती है पराली?

धान की फसल कटने के बाद खेतों में फसल के अवशेष बड़ी मात्रा में बच जाते हैं। अगली फसल की बुवाई के लिए खेत जल्दी तैयार करने की जरूरत होती है। ऐसे में कुछ किसान कम समय और कम खर्च में खेत साफ करने के लिए पराली जला देते हैं। इससे निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ाता है और सांस संबंधी परेशानियों का खतरा पैदा कर सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जुर्माने, मुकदमों और निगरानी के बाद भी पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी रोक कब लगेगी। इसके लिए किसानों को पराली के वैकल्पिक प्रबंधन के साधन उपलब्ध कराना और उन्हें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना भी जरूरी है।

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