हरियाणा में पिता भूल गए 10 बेटियों के नाम, बेटे के जन्म के बाद इंटरनेट हुआ हैरान: 11 साल, 11 बार गर्भधारण

Vin News Network
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बेटा जन्म लेने के बाद पिता ने 10 बेटियों के नाम याद नहीं किए, सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी।

हरियाणा के जिन्द जिले से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने देश में लिंग भेदभाव और बेटियों के प्रति सामाजिक मानसिकता पर फिर से बहस छेड़ दी है। इस जोड़े की शादी 19 साल पहले हुई थी और अब उनके घर 11वें बच्चे के रूप में एक बेटे का जन्म हुआ है। इससे पहले इस जोड़े के घर 10 बेटियां थीं।

स्थानीय मीडिया से बातचीत में पिता ने अपनी सबसे बड़ी बेटी श्रिणा का नाम बताया, जो अब कक्षा 12 में पढ़ रही है, और उसके बाद अमृता, जो कक्षा 11 में है। उन्होंने कुछ और बेटियों के नाम भी बताए, लेकिन सभी 10 बेटियों के नाम याद नहीं कर पाए। यह घटना वीडियो के रूप में सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई और लोगों के बीच चौंकाने वाली प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।

मां और बच्चे की स्थिति गंभीर

ओजस अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि गर्भावस्था और प्रसव दोनों ही माता और नवजात के लिए उच्च जोखिम वाले थे। बच्चे के शरीर में केवल 5 ग्राम खून था, और दोनों को जन्म के बाद चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है।

सोशल मीडिया पर विवाद और आलोचना

वीडियो क्लिप के वायरल होने के बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इस मामले पर चिंता और नाराजगी व्यक्त की। कुछ ने माता-पिता की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए, जबकि कई ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि लिंगवाद और पुरुष प्रधान मानसिकता महिलाओं पर बार-बार गर्भधारण का शारीरिक और मानसिक बोझ डालती है।

एक यूजर ने लिखा, “एक महिला ने 11वें बच्चे के रूप में बेटा जन्म दिया, जबकि पहले 10 बेटियां थीं। सरकार को इन सभी 11 बच्चों को उनके माता-पिता से लेना चाहिए; ये माता-पिता बच्चों की देखभाल के लिए सक्षम नहीं हैं।”

दूसरे ने टिप्पणी की, “पुरुषों का ‘बेटा चाहिए’ का जुनून इतना गहरा है कि महिलाओं का शरीर परीक्षण और त्रुटि मशीन बन जाता है। 10 बेटियां थीं, लेकिन बेटा आता है और समाज अचानक जाग जाता है। यह संस्कृति नहीं है। यह परंपरा नहीं है। यह असुरक्षा, अधिकार की भावना और कोई जवाबदेही नहीं है। महिलाओं को जन्मों के लिए दोष देना बंद करें, पुरुषों से सवाल करें जो बेटियों को स्वीकार नहीं कर सकते।”

समाज में लिंग भेदभाव का मुद्दा

यह मामला एक बार फिर देश में बेटियों और बेटों के प्रति सामाजिक प्राथमिकताओं को उजागर करता है। कई हिस्सों में बेटों को परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है, जबकि बेटियों को दहेज, शादी खर्च और अन्य आर्थिक बोझ के कारण ‘संकट’ माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की मानसिकता महिलाओं के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालती है।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि लिंग समानता और बेटियों की सुरक्षा के लिए जागरूकता अभियान बढ़ाए जाने चाहिए। साथ ही, माता-पिता को जिम्मेदारी और बच्चों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर उठी आलोचना और चर्चा यह संकेत देती है कि अब लोग ऐसे मामले को केवल व्यक्तिगत घटना नहीं बल्कि सामाजिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

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