Potato Farming Alert: आलू किसानों के लिए चेतावनी, मानसून में बढ़ा लेट ब्लाइट रोग का खतरा; जानें बचाव के आसान उपाय

Vin News Network
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आलू की फसल में लेट ब्लाइट रोग से बचाव

विन न्यूज़ नेटवर्क। देश के कई हिस्सों में मानसून का मौसम जारी है। हालांकि कुछ राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है, लेकिन जहां नमी और हल्की बारिश का दौर बना हुआ है, वहां आलू की खेती करने वाले किसानों के लिए चिंता बढ़ गई है। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने किसानों को आगाह करते हुए कहा है कि इस मौसम में आलू की फसल पर लेट ब्लाइट (पिछेता रोग) का खतरा तेजी से बढ़ सकता है। यदि समय रहते इस बीमारी की पहचान और रोकथाम नहीं की गई तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है।

क्या है लेट ब्लाइट या पिछेता रोग?

लेट ब्लाइट आलू की सबसे गंभीर फफूंद जनित बीमारियों में से एक मानी जाती है। यह फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टन्स (Phytophthora infestans) नामक फंगस के कारण फैलती है। बारिश के मौसम में जब वातावरण में नमी अधिक होती है और तापमान अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, तब यह फंगस तेजी से सक्रिय हो जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह बीमारी बहुत कम समय में पूरे खेत में फैल सकती है। यदि शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए तो कुछ ही दिनों में हरी-भरी फसल पूरी तरह खराब हो सकती है।

रोग की पहचान कैसे करें?

किसानों को सलाह दी गई है कि वे प्रतिदिन सुबह और शाम अपने खेत का निरीक्षण करें। यदि पौधों की निचली पत्तियों के किनारों पर पानी जैसे हल्के धब्बे दिखाई दें और कुछ समय बाद उनका रंग गहरा भूरा या काला होने लगे, तो यह लेट ब्लाइट का शुरुआती संकेत हो सकता है।

जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, रोग पौधे के अन्य हिस्सों में फैलने लगता है। बाद में इसका असर मिट्टी के अंदर मौजूद आलू पर भी पड़ता है। संक्रमित कंद अंदर से लाल-भूरे रंग के दिखाई देते हैं, सड़ने लगते हैं और उनमें दुर्गंध आने लगती है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।

समय पर रोकथाम है सबसे बड़ा बचाव

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान का कहना है कि इस बीमारी से बचने के लिए फसल की नियमित निगरानी सबसे जरूरी है। शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही तुरंत फफूंदनाशी का छिड़काव करना चाहिए, ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर किया गया उपचार किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से बचा सकता है और फसल की गुणवत्ता भी बनी रहती है।

किन फफूंदनाशकों के उपयोग की सलाह?

संस्थान ने किसानों को मैनकोजेब (Mancozeb) या क्लोरोथालोनिल (Chlorothalonil) युक्त फफूंदनाशकों के उपयोग की सलाह दी है।

विशेषज्ञों के अनुसार-

  • प्रति हेक्टेयर लगभग 1,000 लीटर पानी में 2 से 2.5 किलोग्राम फफूंदनाशी मिलाकर छिड़काव करें।
  • आवश्यकता के अनुसार लगभग 10 दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव किया जा सकता है।
  • मौसम में लगातार नमी बनी रहने पर खेत की निगरानी और भी बढ़ा दें।

रसायनों का उपयोग हमेशा कृषि विशेषज्ञों की सलाह, उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विभाग के निर्देशों के अनुसार ही करें।

फसल बचाने के लिए अपनाएं ये सावधानियां

आलू की खेती करने वाले किसान कुछ सामान्य उपाय अपनाकर भी बीमारी के खतरे को कम कर सकते हैं-

  • खेत का नियमित निरीक्षण करें।
  • संक्रमित पौधों को तुरंत अलग करें।
  • खेत में पानी का जमाव न होने दें।
  • संतुलित पोषक तत्वों का प्रयोग करें।
  • मौसम पूर्वानुमान पर नजर रखें और लगातार नमी की स्थिति में सतर्क रहें।
  • केवल अनुशंसित फफूंदनाशकों का ही निर्धारित मात्रा में उपयोग करें।

समय रहते सतर्क रहना है जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि लेट ब्लाइट ऐसी बीमारी है जो बहुत तेजी से फैलती है। इसलिए किसान यदि शुरुआती संकेतों को पहचान लें और तुरंत उपचार शुरू कर दें, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। मानसून के पूरे मौसम में खेत की नियमित निगरानी और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार प्रबंधन करना ही सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।

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