उमर ख़ालिद पर आक्रोश, अफ़ज़ल गुरु पर ख़ामोशी: कांग्रेस की दोहरी राजनीति पर सवाल

Vin News Network
Vin News Network
7 Min Read
उमर ख़ालिद की जमानत पर विरोध और अफ़ज़ल गुरु के मामले में कांग्रेस की चुप्पी पर उठते सवाल

करीब दो दशकों के अंतराल पर दो मुक़दमे, दो अलग-अलग स्थान और दो अलग-अलग समय लेकिन राज्य की ओर से लगाए गए आरोपों की भाषा चौंकाने वाली हद तक मिलती-जुलती दिखती है। एक मामला 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले से जुड़ा है, जिसमें अफ़ज़ल गुरु को दोषी ठहराया गया। दूसरा 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ा है, जिसमें उमर ख़ालिद पर साज़िश रचने के आरोप हैं। इन दोनों के बीच सबसे बड़ा फर्क कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिक्रिया का है खासतौर पर कांग्रेस पार्टी की।

आज उमर ख़ालिद को जमानत न मिलने पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता खुलकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना कर रहे हैं। इमरान मसूद ने जमानत को मौलिक अधिकार बताया है। प्रियंक खड़गे ने कथित दोहरे मापदंडों की बात करते हुए पूछा है कि जब बड़े दोषियों को जमानत मिल सकती है, तो ख़ालिद अब भी जेल में क्यों हैं। उदित राज ने इस निर्णय को “दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया है। लेकिन यही आक्रोश और संवेदना कांग्रेस के अतीत के रुख के साथ रखने पर असहज सवाल खड़े करती है।

क्योंकि जब अफ़ज़ल गुरु कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार के दौर में फांसी के फंदे तक पहुँचा, तब न जमानत को मौलिक अधिकार बताया गया, न लंबी कैद पर चिंता जताई गई और न ही राज्य की सबसे कठोर कार्रवाई पर असहमति दिखी। गुरु को कभी जमानत नहीं मिली। कांग्रेस ने उनकी लंबी हिरासत पर सवाल नहीं उठाया। 2013 में उन्हें तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई बिना समय पर परिवार को सूचना दिए, बिना अंतिम मुलाकात का अवसर दिए। यह विरोधाभास एक सीधा सवाल उठाता है: तब चुप्पी क्यों थी और अब सहानुभूति क्यों?

राजनीतिक शोर-शराबे में अक्सर यह तथ्य दब जाता है कि दोनों मामलों में अभियोजन की कानूनी संरचना काफ़ी हद तक समान है। जांच एजेंसियों के अनुसार, न अफ़ज़ल गुरु और न ही उमर ख़ालिद पर सीधे हिंसा करने का आरोप है। दोनों पर साज़िश रचने का आरोप है परदे के पीछे रहकर योजना बनाने, सहयोग जुटाने और घटनाओं को दिशा देने का।

अफ़ज़ल गुरु पर आरोप था कि उन्होंने संसद पर हमले में शामिल आतंकियों के लिए लॉजिस्टिक्स, ठिकाना और अन्य मदद मुहैया कराई। वहीं दिल्ली पुलिस का कहना है कि उमर ख़ालिद ने 2020 के दंगों से पहले कथित तौर पर बैठकों, भाषणों, संदेशों और समन्वय के ज़रिये हिंसा भड़काने की योजना में भूमिका निभाई खुद सड़कों पर उतरे बिना। आरोपों का स्वरूप अलग दिख सकता है, लेकिन अभियोजन की रीढ़ एक जैसी है: साज़िश।
कानून बदले हैं, लेकिन ढांचा नहीं। अफ़ज़ल गुरु पर पोटा, विस्फोटक अधिनियम और आईपीसी की वे धाराएँ लगीं जो देश के खिलाफ युद्ध, साज़िश और हत्या से जुड़ी हैं। उमर ख़ालिद पर यूएपीए, आर्म्स एक्ट और आईपीसी की वही मूल धाराएँ लागू हैं। दोनों मामलों में अभियोजन का केंद्रीय तर्क साज़िश है। इरादे को साबित करना सबसे बड़ा मैदान है। और सख़्त आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत जमानत लगभग असंभव हो जाती है।

दोनों चार्जशीट को साथ रखकर देखें तो समानताएँ और स्पष्ट हो जाती हैं। एक मामला देश की सर्वोच्च संस्था पर सीधे आतंकी हमले से जुड़ा था। दूसरा ऐसे विरोध प्रदर्शनों से निकला, जो सांप्रदायिक हिंसा में बदल गए। पैमाना और प्रतीकात्मकता अलग है, लेकिन कानूनी तर्क वही है।
दोनों मामलों में अप्रत्यक्ष साक्ष्यों पर भारी निर्भरता है। अफ़ज़ल गुरु के मुक़दमे में कॉल रिकॉर्ड, बरामदगी और गवाहियों को अहम माना गया। उमर ख़ालिद के मामले में भाषण, व्हाट्सऐप चैट, विरोध बैठकों का विवरण और संरक्षित गवाह अभियोजन का आधार हैं। हिंसा स्थल पर शारीरिक मौजूदगी दोनों ही मामलों में केंद्रीय नहीं है; आरोप यह है कि घटनाओं का संचालन पर्दे के पीछे से हुआ।

बेशक, महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। अफ़ज़ल गुरु को दोषी ठहराया गया और फांसी दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने संसद पर हमले को “राष्ट्र पर हमला” बताया था। उमर ख़ालिद का मुक़दमा अभी जारी है। उन्होंने सभी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि उनकी गिरफ़्तारी असहमति को अपराध बनाती है। गुरु के विपरीत, ख़ालिद पर किसी विदेशी आतंकी संगठन से संबंध का आरोप नहीं है; उन पर घरेलू स्तर पर अस्थिरता फैलाने का आरोप है।
फिर भी, एक साझा धागा साफ़ दिखता है। जब राज्य राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देता है, तो साज़िश सबसे प्रभावी आरोप बन जाती है इतनी लचीली कि शब्दों को हिंसा से, बैठकों को हत्या से और इरादे को आतंक से जोड़ दे। यही आरोप जमानत के दरवाज़े लगभग बंद कर देता है और राजनीतिक सूक्ष्मता के लिए बहुत कम जगह छोड़ता है।

यही वह बिंदु है जहाँ कांग्रेस की मौजूदा प्रतिक्रिया पर सवाल उठते हैं। अगर जमानत मौलिक अधिकार है, अगर लंबी कैद चिंता का विषय है, और अगर सख़्त कानूनों के दुरुपयोग पर आवाज़ उठनी चाहिए तो यह मानक पहले क्यों लागू नहीं हुए? क्या सिद्धांत समय और व्यक्ति के साथ बदलते हैं?
कांग्रेस के आलोचक कहते हैं कि यह चयनात्मक सहानुभूति है। समर्थक तर्क देते हैं कि दोनों मामलों की प्रकृति अलग है। लेकिन तथ्य यह है कि कानूनी औज़ार, अभियोजन की रणनीति और साज़िश का ढांचा इनमें समानताएँ अनदेखी नहीं की जा सकतीं।

आज उमर ख़ालिद के मामले में न्यायिक प्रक्रिया के हर कदम पर राजनीतिक बहस हो रही है। यह लोकतंत्र की सेहत के लिए ज़रूरी भी है। लेकिन उसी लोकतंत्र में निरंतरता भी अपेक्षित है। अगर राज्य की कठोरता पर सवाल हैं, तो वे सार्वभौमिक होने चाहिए केवल वर्तमान के लिए नहीं, अतीत के लिए भी।

यह बहस केवल उमर ख़ालिद या अफ़ज़ल गुरु तक सीमित नहीं है। यह उस सिद्धांत की परीक्षा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राज्य की शक्ति कहाँ तक जायज़ है, और राजनीतिक दल उस शक्ति के इस्तेमाल पर कितनी ईमानदारी से सवाल उठाते हैं। यही वह कसौटी है जिस पर आज कांग्रेस की भूमिका को परखा जा रहा है और शायद आने वाले समय में अन्य दलों की भी।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *