इंडिगो ने ₹900 करोड़ के लिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया: सीमा शुल्क पर बड़ा विवाद

Vin News Network
Vin News Network
3 Min Read
इंडिगो ने दोहरा कराधान बताते हुए, विदेशों में मरम्मत किए गए विमान पुर्जों पर चुकाए गए ₹900 करोड़ से अधिक के सीमा शुल्क की वापसी के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की।


देश की सबसे बड़ी एयरलाइन, इंडिगो (IndiGo), की मूल कंपनी इंटरग्लोब एविएशन लिमिटेड (InterGlobe Aviation Ltd.) ने भारत सरकार के सीमा शुल्क (Customs Duty) विभाग के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक बड़ी याचिका दायर की है। एयरलाइन ने सरकार से ₹900 करोड़ से अधिक की राशि की वापसी (Refund) की मांग की है। यह कानूनी लड़ाई भारत में विमानन उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकती है।

विवाद की जड़: इंजन और पुर्जों का पुन: आयात
पूरा विवाद विमानों के इंजन और उसके कलपुर्जों से जुड़ा है। विमानों के इंजन को नियमित अंतराल पर मरम्मत के लिए विदेशों में भेजा जाता है। मरम्मत होने के बाद, जब ये इंजन और पुर्जे वापस भारत में लाए जाते हैं (पुन: आयात), तो सीमा शुल्क विभाग इन पर भारी सीमा शुल्क लगाता है।

इंडिगो का दावा है कि उन्होंने इन पुर्जों की मरम्मत पर पहले ही माल और सेवा कर (GST) का भुगतान कर दिया है। सरकार द्वारा अब इन पर दोबारा सीमा शुल्क लगाना गैर-कानूनी है और यह सीधा-सीधा ‘दोहरा कराधान’ (Double Taxation) है। दोहरा कराधान तब होता है जब एक ही चीज़ पर दो बार टैक्स लिया जाता है।

इंडिगो का तर्क: यह ‘सेवाओं का आयात’ है
इंडिगो ने कोर्ट में स्पष्ट तर्क दिया है कि जिस वस्तु पर शुल्क लगाया जा रहा है, वह वस्तु नहीं, बल्कि मरम्मत सेवा है।

  • एयरलाइन का कहना है कि उन्होंने सामानों (Goods) का आयात नहीं किया है, क्योंकि इंजन वही है जो भारत से गया था।
  • उन्होंने केवल विदेश से मरम्मत की सेवाएं (Repair Services) ली हैं।
  • इसलिए, मरम्मत की सेवा पर पहले ही GST चुकाया जा चुका है, और अब वापस आने पर सीमा शुल्क लगाना असंवैधानिक है।

इंडिगो के अनुसार, उनका यह कदम न केवल उनके वित्तीय हितों की रक्षा के लिए है, बल्कि यह विमानन उद्योग को अनावश्यक वित्तीय बोझ से बचाने के लिए भी ज़रूरी है।

सरकार के सामने चुनौती
सीमा शुल्क विभाग का मानना है कि विदेश से मरम्मत होकर वापस आने वाले इंजन और पुर्जे अभी भी पुन: आयातित सामान (Re-imported Goods) की श्रेणी में आते हैं, और इसलिए इन पर नियम के अनुसार शुल्क लगना चाहिए।

हालांकि, इंडिगो की याचिका भारत के कर कानूनों की व्याख्या पर एक बड़ी चुनौती पेश करती है—क्या एक पुरानी वस्तु की मरम्मत को ‘सेवा’ माना जाए या वह ‘सामान’ बनी रहती है? इस मामले का फैसला विमानन क्षेत्र की भविष्य की आयात-निर्यात और कर संबंधी नीतियों को प्रभावित कर सकता है। अगर इंडिगो जीतती है, तो अन्य एयरलाइंस भी इसी तरह के रिफंड की मांग कर सकती हैं। यह मामला दिखाता है कि कैसे जटिल कर कानून आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सेवा क्षेत्रों के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *