नई दिल्ली, मार्च 2026 संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत सोमवार को जोरदार हंगामे के साथ हुई। पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट को लेकर कांग्रेस और विपक्षी दलों ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान को नाकाफी करार देते हुए संसद में तत्काल चर्चा की मांग की। जब यह मांग अस्वीकार कर दी गई तो संपूर्ण विपक्ष ने विरोध दर्ज कराते हुए सदन से वॉकआउट कर लिया।
जयराम रमेश ने बताई हंगामे की वजह
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए बताया कि विदेश मंत्री ने राज्यसभा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर स्वत: संज्ञान लेते हुए वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान पर न तो कोई सवाल पूछा जा सकता है और न ही कोई स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरा विपक्ष पश्चिम एशिया के हालात पर तत्काल चर्चा चाहता था, लेकिन इस मांग को ठुकरा दिया गया, जिसके बाद विरोध स्वरूप वॉकआउट करना पड़ा।
खरगे ने उठाया ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा
राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नियम 176 के तहत ‘भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर उभरती चुनौतियों’ के विषय पर शॉर्ट ड्यूरेशन डिस्कशन का अनुरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि पश्चिम एशिया में तेजी से बदलती भू-राजनीतिक स्थिति अब केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय साख और छवि पर भी पड़ रहा है।
मकर द्वार पर विपक्ष का प्रदर्शन
सोमवार को संसद परिसर में विपक्ष का आक्रोश सड़कों पर भी उतरा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत बड़ी संख्या में विपक्षी सांसद संसद के मकर द्वार पर एकत्र हुए। हाथों में बड़े बैनर थामे विपक्षी सदस्यों ने सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की और पश्चिम एशिया संकट पर सरकार की कथित चुप्पी को लेकर कड़ा विरोध जताया।
कांग्रेस का सरकार पर तीखा हमला
कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर भी सरकार को घेरा। पार्टी ने ‘एक्स’ पर लिखा कि खाड़ी के देश जल रहे हैं, भारतीय वहां फंसे हुए हैं और केंद्र सरकार चुप है। एक अन्य पोस्ट में पार्टी ने कहा कि आज देश को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके और सरकार का डर देश को नुकसान पहुंचा रहा है।
जयशंकर ने क्या कहा?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने बयान में कहा कि भारत शांति, संवाद और कूटनीति का पक्षधर है और क्षेत्र में तनाव कम करने तथा नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की वकालत करता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया में फंसे भारतीयों को सुरक्षित वापस लाने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं और अब तक करीब 67,000 भारतीय नागरिक अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर वापस आ चुके हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मौजूदा हालात में ईरान के शीर्ष नेतृत्व से सीधा संपर्क करना कठिन है, हालांकि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री से बातचीत की है। जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत के राष्ट्रीय हित, जिनमें ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक लक्ष्य शामिल हैं, हमेशा सर्वोपरि रहेंगे और प्रधानमंत्री पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
विपक्ष का कहना है कि यह बयान महज एक औपचारिकता है और इस गंभीर संकट पर संसद में गहन और खुली बहस होनी चाहिए। बजट सत्र के इस दूसरे चरण में पश्चिम एशिया का मुद्दा सरकार और विपक्ष के बीच एक बड़े टकराव की वजह बनता दिख रहा है।