क्या आयकर विभाग ऑनलाइन खर्च और डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखता है? PIB फैक्ट चेक ने बताई सच्चाई

Vin News Network
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PIB ने आयकर विभाग द्वारा ऑनलाइन निगरानी के दावों को बताया भ्रामक

आयकर विभाग द्वारा आम नागरिकों की ऑनलाइन गतिविधियों और डिजिटल खर्च पर निगरानी किए जाने के दावों को लेकर हाल ही में सोशल मीडिया पर काफी चर्चा रही। इन दावों पर अब प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक इकाई ने स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब देते हुए भ्रम को पूरी तरह खारिज कर दिया है। PIB ने साफ कहा है कि आयकर विभाग न तो ऑनलाइन शॉपिंग, न डिजिटल पेमेंट, न ही किसी व्यक्ति के ऐप आधारित लेन-देन या निजी खर्च की आदतों पर निगरानी करता है।

PIB फैक्ट चेक के अनुसार, एक कंटेंट क्रिएटर द्वारा यह दावा किया गया था कि आयकर विभाग लोगों के ईमेल, सोशल मीडिया अकाउंट, ट्रेडिंग ऐप्स और निजी डिजिटल खातों तक पहुंच रखता है। इस दावे को पूरी तरह गलत और भ्रामक करार दिया गया है। फैक्ट चेक में स्पष्ट किया गया कि भारत में ऐसा कोई सिस्टम या तंत्र मौजूद नहीं है, जिसके जरिए किसी नागरिक की सामान्य डिजिटल या ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी की जाए।

हालांकि, फैक्ट चेक में यह भी बताया गया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में आयकर विभाग को सीमित अधिकार प्राप्त हैं। आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 247 के तहत सर्च और सर्वे ऑपरेशन का प्रावधान है। इस प्रावधान के तहत आयकर विभाग किसी व्यक्ति के निजी डिजिटल स्पेस तक पहुंच बना सकता है, लेकिन यह केवल तब संभव है जब गंभीर कर चोरी के ठोस सबूत हों और विधिवत कानूनी प्रक्रिया के तहत औपचारिक तलाशी शुरू की गई हो।

PIB ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्च और सर्वे की ये शक्तियां किसी भी तरह से नियमित डेटा संग्रह, सामान्य जांच, स्क्रूटनी असेसमेंट या नागरिकों की रोजमर्रा की निगरानी के लिए इस्तेमाल नहीं की जा सकतीं। इनका उद्देश्य केवल काले धन, बड़े पैमाने पर कर चोरी और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं से निपटना है। गौर करने वाली बात यह है कि दस्तावेज जब्त करने और तलाशी लेने का अधिकार नया नहीं है, बल्कि यह आयकर अधिनियम, 1961 के समय से ही मौजूद रहा है।

इसके अलावा, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 285BA के तहत उच्च मूल्य के लेन-देन की रिपोर्टिंग का प्रावधान है। PIB फैक्ट चेक ने साफ किया कि इस तरह की रिपोर्टिंग को किसी भी तरह की निगरानी या सर्विलांस से जोड़कर देखना गलत है। यह केवल एक नियामकीय प्रक्रिया है, जिसका मकसद वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखना है।

धारा 285BA के अंतर्गत स्टेटमेंट ऑफ फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस (SFT) फ्रेमवर्क लागू है। इसके तहत बैंक, वित्तीय संस्थान, रजिस्ट्रार और अन्य निर्दिष्ट इकाइयों को कुछ सीमित उच्च मूल्य के लेन-देन की जानकारी आयकर विभाग को देनी होती है। इसमें बड़े नकद जमा, उच्च मूल्य की संपत्ति खरीद, बड़े निवेश जैसे लेन-देन शामिल हो सकते हैं। PIB ने स्पष्ट किया कि यह रिपोर्टिंग वर्षों से लागू है और इसका मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति की ऑनलाइन गतिविधि, व्यवहार या खर्च की आदतों पर नजर रखी जा रही है।

PIB ने यह भी जोर देकर कहा कि SFT के तहत किसी तरह की बिहेवियरल प्रोफाइलिंग, ऑनलाइन ट्रैकिंग या डिजिटल फुटप्रिंट की निगरानी नहीं की जाती। यह केवल संस्थागत रिपोर्टिंग है, जो कानून के तहत नियमित अनुपालन का हिस्सा है।

इस बीच, आयकर कानून में एक बड़े बदलाव की पृष्ठभूमि भी सामने आई है। दशकों से लागू आयकर अधिनियम, 1961 को अब आयकर अधिनियम, 2025 से प्रतिस्थापित किया जा रहा है। नया कानून वित्त वर्ष 2025-26 से प्रभावी होगा और इसका असर 1 अप्रैल 2026 से दाखिल होने वाले आयकर रिटर्न पर पड़ेगा।

सरकार के अनुसार, 1961 का कानून समय-समय पर संशोधनों के बावजूद अत्यंत जटिल और बोझिल हो गया था। इसमें 800 से अधिक धाराएं थीं और दशकों की व्याख्याओं ने इसे आम करदाताओं के लिए समझना मुश्किल बना दिया था। इसी कारण भारत सरकार ने कर कानून में व्यापक सुधार की प्रक्रिया शुरू की।

नया आयकर अधिनियम, 2025 कर प्रणाली को सरल, स्पष्ट और तकनीक के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें अनावश्यक और दोहराव वाले प्रावधानों को हटाया गया है, पुराने और अप्रासंगिक शब्दों को खत्म किया गया है और अनुपालन से जुड़े नियमों को अधिक स्पष्ट बनाया गया है। सरकार का दावा है कि यह कानून 21वीं सदी की डिजिटल अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप है।

PIB फैक्ट चेक के जरिए सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि आम नागरिकों को अपने डिजिटल जीवन को लेकर डरने की जरूरत नहीं है। आयकर विभाग का फोकस कर अनुपालन और बड़े वित्तीय अपराधों पर है, न कि लोगों की निजी ऑनलाइन गतिविधियों पर। इस तरह, सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रामक दावों पर विराम लगाते हुए PIB ने स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।

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