वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक अनिरुद्धाचार्य और दिल्ली हाई कोर्ट के बीच हुई कानूनी बहस ने अभिव्यक्ति की आजादी और ‘पर्सनालिटी राइट्स’ (व्यक्तित्व अधिकारों) को लेकर एक नई चर्चा छेड़ दी है। अनिरुद्धाचार्य ने कोर्ट में गुहार लगाई थी कि सोशल मीडिया पर उनके वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर उनकी छवि खराब की जा रही है, जिस पर कोर्ट ने उन्हें अंतरिम सुरक्षा तो दी, लेकिन साथ ही गहरी आध्यात्मिक और कानूनी सीख भी दे डाली।
हाई कोर्ट की नसीहत: ‘आदि शंकराचार्य मानहानि का केस नहीं, शास्त्रार्थ करते थे’
दिल्ली हाई कोर्ट में सोमवार, 30 मार्च 2026 को अनिरुद्धाचार्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान माहौल तब दिलचस्प हो गया जब जस्टिस गेडेला ने कथावाचक के सिद्धांतों पर ही सवाल पूछ लिए। अनिरुद्धाचार्य का पक्ष था कि यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर उनके वीडियो को डीपफेक और एआई (AI) के जरिए गलत तरीके से पेश किया जा रहा है, जिससे उनके अनुयायियों का विश्वास डगमगा रहा है।
इस पर कोर्ट ने बेहद कड़ा लेकिन दार्शनिक रुख अपनाते हुए कहा कि एक आध्यात्मिक गुरु को प्रशंसा और आलोचना से ऊपर होना चाहिए। कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि आदि शंकराचार्य ने अपने विरोधियों को चुप कराने के लिए कभी मानहानि के मुकदमे दर्ज नहीं किए, बल्कि वे ‘शास्त्रार्थ’ (वाद-विवाद) के जरिए अपनी बात साबित करते थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में हर किसी को किसी के विचारों से असहमत होने या उसकी आलोचना करने का अधिकार है, बशर्ते वह अपमानजनक न हो।
‘विवादित सामग्री तो मंगल ग्रह पर भी है’
बहस के दौरान जब अनिरुद्धाचार्य के वकील ने कहा कि विवादित सामग्री उनके मुवक्किल की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचा रही है, तो कोर्ट ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की, “विवादित सामग्री तो मंगल ग्रह पर भी है और शायद बृहस्पति पर भी।” कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि हर कोई राहत पाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ही क्यों आना चाहता है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में भी अदालतें मौजूद हैं।
कोर्ट ने वकील से तीखा सवाल किया, “आप अपनी प्रतिष्ठा से इतने जुड़े हुए क्यों हैं? अगर आप एक दर्शन का प्रचार करते हैं, तो आपको मान-सम्मान की इच्छा से ऊपर होना चाहिए।” हालांकि, जब वकील ने ‘गुरुजी एडिक्ट्स’ जैसे हैंडल द्वारा सट्टेबाजी और गेमिंग विज्ञापनों में कथावाचक की फोटो इस्तेमाल करने और डीपफेक वीडियो का सबूत दिया, तो कोर्ट ने माना कि यह गंभीर विषय है।
कोर्ट का फैसला: आलोचना हक है, लेकिन बदनाम करना नहीं
लंबी बहस के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने अनिरुद्धाचार्य को अंतरिम संरक्षण (Interim Protection) प्रदान किया। कोर्ट ने आदेश दिया कि जो सामग्री एआई द्वारा निर्मित है या जो उनकी छवि का व्यावसायिक दुरुपयोग कर रही है, उसे हटाया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों को तीखी आलोचना और असहमति के प्रति अधिक सहनशील होना होगा।
अदालत की यह टिप्पणी भविष्य के लिए एक बड़ा नजीर साबित होगी कि आध्यात्मिक गुरुओं को अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाइयों के बजाय तर्कों और संवाद का सहारा लेना चाहिए।