नई दिल्ली/पटना। बिहार की राजनीति में वोटर अधिकार यात्रा के समाप्त होते ही महागठबंधन के भीतर दरार गहराने लगी है। यात्रा की सफलता का श्रेय कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने अपने खाते में डाल लिया, जबकि इसे सफल बनाने में राजद नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने सबसे ज्यादा मेहनत की थी। अब यह मुद्दा महागठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर टकराव का कारण बनता दिख रहा है।
कांग्रेस पार्टी यात्रा की सफलता से गदगद है और यही आत्मविश्वास अब उसे आगामी विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के भीतर ज्यादा हिस्सेदारी मांगने की ओर ले जा रहा है। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस अब बिहार में 90 सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना रही है।
वोटर अधिकार यात्रा और राजनीतिक क्रेडिट का खेल
तेजस्वी यादव ने इस यात्रा में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। उन्होंने गांव-गांव और जिले-जिले में जनता से जुड़ाव कायम किया। मगर, कांग्रेस पार्टी और खासकर राहुल गांधी ने यात्रा की पूरी उपलब्धि अपने नाम कर ली। कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता इस यात्रा को सिर्फ “राहुल गांधी की यात्रा” बताने में जुटे हुए हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अगर तेजस्वी को दरकिनार कर कांग्रेस अपनी ताकत दिखाती रही तो यह महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर सकता है।
कांग्रेस का आत्मविश्वास और नई मांग
यात्रा के बाद कांग्रेस में एक नया आत्मविश्वास देखने को मिला है। पार्टी नेताओं का मानना है कि बिहार की जनता में कांग्रेस की पकड़ बढ़ी है और यही वजह है कि पार्टी अब 90 सीटों की मांग कर रही है। सूत्र बताते हैं कि सोमवार को पटना के एक होटल में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं की अनौपचारिक बैठक हुई। इस बैठक में 70 सीटों के बजाय 90 सीटों पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा गया। प्रदेश स्तर पर भी इस प्रस्ताव को समर्थन मिला है।
महागठबंधन के भीतर नई चुनौती
महागठबंधन में सीट शेयरिंग का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। पहले भी कांग्रेस और राजद के बीच सीटों को लेकर खींचतान होती रही है। लेकिन इस बार कांग्रेस की आक्रामक मांग से राजद की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव इस समय चाहेंगे कि महागठबंधन की एकजुटता बनी रहे, लेकिन कांग्रेस का यह रवैया उन्हें परेशान कर सकता है।
संभावित असर
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर कांग्रेस 90 सीटों की मांग पर अड़ती है तो महागठबंधन में दरार पड़ सकती है। राजद और कांग्रेस दोनों के बीच खींचतान बढ़ने पर इसका फायदा सीधे तौर पर बीजेपी और एनडीए को मिल सकता है। इसके अलावा, जनता के बीच यह संदेश भी जा सकता है कि महागठबंधन अंदरूनी कलह में उलझा हुआ है। यह स्थिति गठबंधन की चुनावी संभावनाओं को कमजोर कर सकती है।
आगे की राह
अब सबकी नजर महागठबंधन के फोरम पर है, जहां कांग्रेस नेता अपनी सीट मांग को आधिकारिक रूप से रखेंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि राजद और जेडीयू इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं। कांग्रेस को मिल रही “यात्रा की सफलता” की चमक क्या सीटों में तब्दील हो पाएगी या नहीं, यह आने वाले दिनों में तय होगा। लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति एक बार फिर सीट शेयरिंग की खींचतान के कारण गरमाने वाली है।