विन न्यूज़ नेटवर्क। लखनऊ के चर्चित इंद्रदेव सिंह हत्याकांड में आखिरकार अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा दी है। सीबीआई की विशेष अदालत ने विक्रम यादव, पन्ना सिंह और बृजेश यादव को हत्या की साजिश और वारदात को अंजाम देने का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही तीनों पर डेढ़-डेढ़ लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
यह मामला इसलिए भी बेहद चर्चित रहा क्योंकि मृतक इंद्रदेव सिंह लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष थे और उनकी बेटी लक्ष्मी सिंह वर्तमान में नोएडा पुलिस कमिश्नर हैं।
फैसले के वक्त अदालत में मौजूद था परिवार
सीबीआई की विशेष अदालत में फैसला सुनाए जाने के दौरान इंद्रदेव सिंह की पत्नी नयनतारा सिंह, बेटी लक्ष्मी सिंह और परिवार के अन्य सदस्य मौजूद रहे। लंबे समय से न्याय की लड़ाई लड़ रहे परिवार के लिए यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामले में कुल छह आरोपी थे, लेकिन सुनवाई के दौरान तीन आरोपियों की मौत हो चुकी थी। इसलिए अदालत ने शेष तीन आरोपियों के खिलाफ फैसला सुनाया।
दिनदहाड़े की गई थी हत्या
यह वारदात 8 अगस्त 2002 को हुई थी। शाम करीब 4 बजे लखनऊ के कैसरबाग टेलीफोन एक्सचेंज के पास इंद्रदेव सिंह पर हमला किया गया। हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
हत्या के बाद पूरे लखनऊ में सनसनी फैल गई थी। एक वरिष्ठ वकील की दिनदहाड़े हत्या ने कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए थे।
पत्नी ने दर्ज कराया था मुकदमा
हत्या के बाद इंद्रदेव सिंह की पत्नी नयनतारा सिंह ने पुलिस में मामला दर्ज कराया। शुरुआती एफआईआर में सुरेश वर्मा, रामकुमार वर्मा, सुषमा वर्मा, सुरेश वर्मा और सुरजन वर्मा समेत कई लोगों को नामजद किया गया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए बाद में इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई।
सीबीआई जांच में सामने आई साजिश
सीबीआई की जांच में हत्या के पीछे जमीन विवाद की बड़ी साजिश सामने आई। जांच एजेंसी के अनुसार करीब पांच बीघा जमीन को लेकर विवाद चल रहा था और इसी को लेकर इंद्रदेव सिंह की हत्या की योजना बनाई गई थी।
जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरी साजिश को एक बर्खास्त लेखपाल ने रचा था।
किसने क्या भूमिका निभाई?
अदालत ने अपने फैसले में तीनों दोषियों की भूमिकाओं को स्पष्ट किया।
- विक्रम यादव – मुख्य शूटर, जिसने इंद्रदेव सिंह पर गोलियां चलाईं।
- बृजेश यादव – वारदात के समय स्कूटर चला रहा था।
- पन्ना सिंह – हत्या की साजिश में शामिल था।
अदालत ने माना कि हत्या पूर्व नियोजित थी और तीनों ने मिलकर इसे अंजाम दिया।
2004 में दाखिल हुई थी चार्जशीट
सीबीआई ने लगभग दो साल की जांच के बाद 2004 में अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद लंबे समय तक गवाहों, दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर सुनवाई चली।
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तीनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी माना।
24 साल बाद मिला न्याय
करीब 24 साल तक चले इस मुकदमे में अब जाकर अंतिम फैसला आया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बताता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में भले ही न्याय मिलने में समय लगे, लेकिन अदालतें अंततः सबूतों के आधार पर निर्णय देती हैं। इंद्रदेव सिंह का नाम लखनऊ के वरिष्ठ अधिवक्ताओं में गिना जाता था और उनकी हत्या ने उस समय पूरे न्यायिक समुदाय को झकझोर दिया था।