अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके शीर्ष सहयोगियों ने एक बार फिर भारत को निशाने पर लिया है। सोमवार को ट्रंप ने दावा किया कि भारत के साथ व्यापार पूरी तरह से “एकतरफा आपदा” रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत ने दशकों से अमेरिका पर अत्यधिक ऊंचे टैरिफ लगाए हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियां भारतीय बाज़ार में सामान बेचने से वंचित रह गईं।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी प्रधानमंत्री शी जिनपिंग से मिले थे। इस मुलाकात के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर भारत पर तीखा हमला बोला।
ट्रंप का दावा: भारत ने शून्य टैरिफ की पेशकश की
ट्रंप ने कहा कि नई दिल्ली ने अमेरिका पर लगाए गए टैरिफ को “शून्य” करने की पेशकश की थी, लेकिन इसमें देरी हो रही है। उन्होंने लिखा – “वे हमें भारी मात्रा में सामान बेचते हैं, लेकिन हम उन्हें बहुत कम बेच पाते हैं। यह कई दशकों से एकतरफा रिश्ता है। भारत ने अब तक हम पर इतने ऊंचे टैरिफ लगाए हैं कि हमारे व्यवसाय यहां सफल नहीं हो पा रहे।”
नई दिल्ली इस दावे को पहले ही खारिज कर चुकी है। भारत का कहना है कि उसकी व्यापार नीतियाँ वैश्विक बाज़ार की परिस्थितियों और घरेलू उद्योगों के हितों के आधार पर तय होती हैं।
अमेरिका का टैरिफ वार
अमेरिका ने हाल ही में भारतीय वस्तुओं पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया। यह कदम अमेरिका द्वारा भारत पर “तीव्र व्यापार असंतुलन” का आरोप लगाने के बाद उठाया गया। इसके अलावा, भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने के फैसले पर भी वाशिंगटन ने आपत्ति जताई और 25% और टैरिफ लगा दिया। इस तरह भारतीय वस्तुओं पर कुल टैरिफ अब 50% तक पहुँच गया है।
ट्रंप ने अपने बयान में दोहराया कि भारत अपना ज़्यादातर तेल और सैन्य उत्पाद रूस से खरीदता है और अमेरिका से बहुत कम लेता है। उन्होंने भारत के रूसी तेल सौदे रोकने की अमेरिकी मांग को ठुकराने पर भी नाराज़गी जताई।
भारत का जवाब: “हम अपने हित में फ़ैसले लेते हैं”
नई दिल्ली ने ट्रंप के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बाज़ार की ज़रूरतों के आधार पर फ़ैसले लेता है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने साफ किया कि भारत किसी भी दबाव में आकर रूस के साथ व्यापार बंद नहीं करेगा। भारत का तर्क है कि सस्ते कच्चे तेल के सौदे उसके नागरिकों और उद्योगों के लिए फायदेमंद हैं, और इस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
विश्लेषकों की आलोचना
कई अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने ट्रंप की इस नीति की आलोचना की है। निवेश बैंक जेफ़रीज़ ने कहा कि यह टैरिफ मुख्य रूप से ट्रंप की व्यक्तिगत नाराज़गी और राजनीतिक रणनीति का परिणाम है। राजनीतिक टिप्पणीकार रिक सांचेज़ ने कहा कि ट्रंप अक्सर “बदले की भावना, द्वेष और अवैज्ञानिक सोच” के आधार पर फ़ैसले लेते हैं, और भारत पर टैरिफ इसका ताज़ा उदाहरण है।
अमेरिकी प्रशासन में भ्रम
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ ट्रंप भारत पर हमलावर हैं, वहीं अमेरिकी दूतावास ने नई दिल्ली में साझेदारी की तारीफ़ की है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की तस्वीर के साथ दूतावास ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा – “संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच साझेदारी नई ऊँचाइयों पर पहुंच रही है – यह 21वीं सदी का परिभाषित संबंध है।” यह पोस्ट ठीक उसी दिन आई जब प्रधानमंत्री मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग के साथ बैठक की।
वैश्विक समीकरण और भारत की भूमिका
एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत, रूस और चीन के बीच सहयोग पर ज़ोर दिया गया। विश्लेषकों का कहना है कि इस त्रिपक्षीय साझेदारी ने अमेरिका की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
भारत अब वैश्विक रणनीतिक समीकरणों में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ वह अमेरिका के साथ तकनीक, निवेश और सुरक्षा मामलों में सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ भी पुराने रिश्तों को मज़बूत बना रहा है।
आगे की राह
ट्रंप का भारत पर नया हमला दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों में तनाव को और बढ़ा सकता है। हालांकि, भारत-अमेरिका साझेदारी को लेकर सकारात्मक संकेत भी मिल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह विवाद चुनावी राजनीति और वैश्विक रणनीतिक संतुलन दोनों पर असर डाल सकता है। भारत को अब यह तय करना होगा कि वह कैसे अमेरिका की आपत्तियों का सामना करते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू हितों की रक्षा करता है।
ट्रंप के लगातार हमलों ने भारत-अमेरिका रिश्तों में अस्थिरता ज़रूर पैदा की है, लेकिन दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंध इतनी आसानी से नहीं टूट सकते। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वॉशिंगटन और नई दिल्ली इस व्यापारिक विवाद को बातचीत के ज़रिए हल कर पाते हैं या टकराव और गहराता है।