उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले से एक बार फिर दुखद खबर सामने आई है। जिले में एक और बूथ लेवल अधिकारी (BLO) की मौत का मामला प्रकाश में आया है, जिसने प्रदेश में चल रहे मतदाता सूची संशोधन अभियान के दौरान कर्मचारियों पर बढ़ते काम के बोझ पर गंभीर बहस छेड़ दी है। पिछले कुछ महीनों से लगातार अनेक BLOs की अचानक मौत या आत्महत्या की घटनाएँ सामने आ रही हैं, और मुरादाबाद की यह घटना उसी कड़ी को और दर्दनाक बना रही है।
मुरादाबाद जिले के भोजपुर क्षेत्र में तैनात BLO और शिक्षक सर्वेश सिंह ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। उनके द्वारा छोड़े गए दो-पेज के सुसाइड नोट में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि वे लगातार दबाव, भारी टारगेट और मानसिक तनाव झेल रहे थे। सुसाइड नोट के मुताबिक, शाम के बाद भी कॉल्स लगातार आते थे और उनसे रोजाना 100 से अधिक फॉर्म भरने व वेरिफिकेशन करने की अपेक्षा की जाती थी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पिछले कई दिनों से वे मुश्किल से 2-3 घंटे ही सो पा रहे थे। सर्वेश सिंह की चार बेटियाँ थीं, जिनमें से दो बीमार चल रही थीं। पारिवारिक जिम्मेदारियों और अत्यधिक कार्यभार के बीच, वे मानसिक रूप से टूट चुके थे।
परिवार का आरोप है कि सर्वेश बीमारी और तनाव के बावजूद काम कर रहे थे, जबकि स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें किसी प्रकार की छूट नहीं दी। परिवार का यह भी कहना है कि उन्होंने कई बार अधिकारियों से निवेदन किया कि उन्हें अस्थायी राहत दी जाए, लेकिन उन्हें “काम पूरा करने” का ही निर्देश मिलता रहा। परिवार ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच और आर्थिक मुआवजा देने की मांग की है, ताकि उनकी चार बेटियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
इसी बीच, प्रदेश के बिजनौर जिले में भी एक महिला BLO शोभारानी की अचानक मौत ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया। शोभारानी लंबे समय से डायबिटीज की मरीज थीं और SIR से संबंधित रिकॉर्ड देर रात तक पूरा कर रही थीं। रात में अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। परिवार का कहना है कि वे कई दिनों से आराम नहीं कर पा रही थीं और उन्हें भी लगातार फील्ड व ऑनलाइन काम पूरा करने के निर्देश मिल रहे थे। उनकी मौत को प्रशासन ने ‘प्राकृतिक’ माना, लेकिन परिवार और स्थानीय कर्मचारी संगठनों ने काम के दबाव को भी एक महत्वपूर्ण कारण बताया है।
इन दोनों ताजा घटनाओं के बाद, कर्मचारी संगठनों और विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार से मांग की है कि BLOs पर पड़ रहे दबाव, असमान कार्य-शेड्यूल, असुरक्षित कार्य परिस्थितियों और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी की विस्तृत जांच की जाए। वे यह भी कहते हैं कि BLOs का काम अत्यधिक महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे व्यवस्थित तरीके से प्रबंधित न करना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है। संगठनों का कहना है कि SIR जैसे अभियानों में तय समय से अधिक काम करवाया जाना सामान्य हो गया है, जबकि संसाधन व प्रशिक्षण न्यूनतम हैं।
BLO वह अधिकारी होता है जो सीधे जनता के बीच जाकर वोटर सूची को सही और अपडेटेड रखने का काम करता है—घर-घर जाकर फॉर्म भरना, दस्तावेजों की पुष्टि करना, रिकॉर्ड को ऑनलाइन दर्ज करना, और शिकायतों का समाधान करना। यह काम चुनावी प्रक्रिया की रीढ़ माना जाता है। लेकिन लगातार अधिक काम, डेडलाइन का दबाव और तकनीकी कार्य का अतिरिक्त भार कर्मचारियों के लिए मानसिक व शारीरिक तनाव का कारण बन रहा है।
मुरादाबाद की ताजा घटना बताती है कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक गंभीर मानविक संकट है। लगातार सामने आ रही BLO मौतें यह दर्शाती हैं कि सिस्टम में कुछ मूलभूत खामियाँ हैं, जिन पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। यह समय है कि सरकार, चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन मिलकर उन कारणों को दूर करें जो इन कर्मचारियों को असुरक्षित और अवसादग्रस्त बना रहे हैं।
जब तक BLOs को सुरक्षित कार्य वातावरण, संतुलित कार्यभार और उचित मानसिक-स्वास्थ्य सहायता नहीं दी जाती, तब तक ऐसी घटनाओं का दोहराव रुकना मुश्किल है। यह घटना सिर्फ मुरादाबाद का मुद्दा नहीं, बल्कि चुनाव व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर सवाल है—जिसका समाधान अब अनिवार्य हो गया है।