इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की अग्रिम जमानत अर्जी पर शुक्रवार, 27 फरवरी को सुनवाई होने जा रही है। यह मामला झूंसी थाने में दर्ज यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ा है, जिसमें गिरफ्तारी से बचने के लिए शंकराचार्य ने कोर्ट का रुख किया है। इस याचिका पर सुनवाई जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की सिंगल बेंच में होगी। कोर्ट नंबर 72 में फ्रेश कॉज लिस्ट में यह मामला क्रम संख्या 142 पर सूचीबद्ध है।
इस केस ने अब कानूनी दायरे से बाहर निकलकर सामाजिक और धार्मिक हलकों में भी व्यापक चर्चा और विवाद को जन्म दे दिया है। जहां एक ओर शंकराचार्य न्यायिक राहत की उम्मीद लगाए हुए हैं, वहीं दूसरी ओर उनके समर्थन में कई संत और धार्मिक नेता खुलकर सामने आ रहे हैं।
इसी क्रम में दिनेश फलाहारी महाराज ने इस मामले में एक बड़ा बयान दिया है, जिससे विवाद और गहरा गया है। उन्होंने आरोप लगाने वाले छात्रों और आशुतोष पांडेय के नार्को टेस्ट की मांग की है। इस मांग को लेकर उन्होंने देश के राष्ट्रपति को पत्र भी भेजा है, जिसमें निष्पक्ष जांच की अपील की गई है।
फलाहारी महाराज का कहना है कि पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए नार्को टेस्ट जैसे वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल जरूरी है। उनका दावा है कि इस मामले में साजिश की बू आ रही है और शंकराचार्य को जानबूझकर फंसाने की कोशिश की जा रही है।
इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें खुद एक अज्ञात मोबाइल नंबर से धमकियां दी गई हैं। उनके मुताबिक, उन्हें फर्जी केस में फंसाने की चेतावनी दी गई है, जिससे मामला और गंभीर हो गया है। उन्होंने इसे एक सुनियोजित षड्यंत्र करार दिया।
फलाहारी महाराज ने आशुतोष पांडेय पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि आशुतोष ब्रह्मचारी पहले से ही आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा है और उसका आपराधिक इतिहास रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि गौकशी जैसे मामलों से उसका नाम जुड़ा रहा है और अब वह शंकराचार्य के खिलाफ साजिश रच रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम पर कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम जमानत पर होने वाली सुनवाई इस केस की दिशा तय कर सकती है। अगर अदालत से राहत मिलती है, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तारी से अस्थायी सुरक्षा मिल सकती है। वहीं, अगर याचिका खारिज होती है, तो पुलिस कार्रवाई तेज हो सकती है।
यह मामला अब केवल एक कानूनी विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसमें धार्मिक प्रतिष्ठा, सामाजिक विश्वास और न्यायिक प्रक्रिया तीनों जुड़े हुए हैं। ऐसे में अदालत का फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल सभी की नजरें शुक्रवार को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अग्रिम जमानत मिलती है या नहीं। साथ ही, नार्को टेस्ट की मांग और लगाए गए आरोपों की सच्चाई आने वाले दिनों में जांच के दायरे में और स्पष्ट हो सकती है।