ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वाराणसी से “गोप्रतिष्ठा धर्मयुद्ध यात्रा” की शुरुआत कर दी है। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश में गौहत्या को पूरी तरह बंद कराना और गौमाता को “राज्यमाता” का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर जनजागरण करना है। शनिवार, 7 मार्च की सुबह लगभग 8:30 बजे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती वाराणसी के विद्यामठ से पालकी में सवार होकर इस यात्रा पर निकले। यात्रा शुरू होने से पहले उन्होंने काशी के प्रसिद्ध चिंतामणि गणेश मंदिर और संकटमोचन मंदिर में दर्शन-पूजन किया और हनुमान चालीसा तथा बजरंग बाण का पाठ भी किया।
यात्रा के दौरान उन्होंने सरकार पर भी तीखा निशाना साधते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि चुनी हुई सरकार के रहते हुए भी गौमाता की रक्षा के लिए संतों और समाज को “धर्मयुद्ध” जैसा आंदोलन करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं बल्कि पूरी तरह धार्मिक और सांस्कृतिक भावना से प्रेरित है। उनका कहना है कि गौमाता हिंदू धर्म में पूजनीय हैं और उनकी रक्षा करना प्रत्येक हिंदू का धर्म है।
इस यात्रा का संकल्प छत्रपति शिवाजी जयंती के अवसर पर वाराणसी के शंकराचार्य घाट पर लिया गया था। उस दिन गंगा पूजन, लघु नाटिका और बिरुदावली वाचन जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इसके बाद औपचारिक रूप से इस यात्रा की घोषणा की गई थी। यात्रा शुरू होने से पहले विद्यामठ और संकटमोचन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और गौपूजन भी किया गया।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि उन्होंने सरकार को पहले ही 40 दिनों का अल्टीमेटम दिया था कि गौहत्या को पूरी तरह बंद करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। लेकिन जब इस दिशा में कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया, तो उन्होंने समाज को जागृत करने के लिए इस धर्मयुद्ध यात्रा का मार्ग चुना। उन्होंने यह भी कहा कि यदि प्रशासन इस यात्रा को रोकना चाहे तो वे रुक भी सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि आखिर गौमाता की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण यात्रा से किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए।
यह यात्रा पूर्वांचल और अवध क्षेत्र से होते हुए लखनऊ तक जाएगी। यात्रा के पहले दिन 7 मार्च को जौनपुर और सुल्तानपुर में सभाएं आयोजित की जाएंगी, जबकि रायबरेली में रात्रि विश्राम होगा। 8 मार्च को यात्रा मोहनलालगंज, लालगंज, अचलगंज और उन्नाव में पहुंचेगी। इसके बाद 9 मार्च को बांगरमऊ, बघौली और नैमिषारण्य में कार्यक्रम होंगे। 10 मार्च को सिंधौली और इजौटा होते हुए यात्रा लखनऊ की ओर बढ़ेगी। 11 मार्च को लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल पर शंखनाद कार्यक्रम के साथ इस यात्रा का प्रमुख आयोजन होगा।
लखनऊ में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में गोमय से बने गणेश जी का पूजन, गो-ध्वज की प्रतिष्ठा और संतों का उद्बोधन भी होगा। शंकराचार्य ने देशभर के संतों, समाज के विभिन्न वर्गों और विशेष रूप से जनप्रतिनिधियों से इस यात्रा में शामिल होने की अपील की है। उन्होंने कहा कि विधायक और सांसद भी आगे आकर इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट भूमिका निभाएं।
उन्होंने समाज से अपील करते हुए कहा कि गौहत्या रोकने के लिए हिंदू समाज के सभी वर्गों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को एकजुट होकर आगे आना होगा। यह केवल धार्मिक आस्था का विषय ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
यात्रा के दौरान वाराणसी के विद्यामठ परिसर में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। शंकराचार्य ने गौपूजन के बाद अपनी यात्रा का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि यह यात्रा हिंदू एकता और गौभक्ति के संकल्प का प्रतीक है। साथ ही उन्होंने लोगों से अपील की कि इस यात्रा को राजनीतिक नजरिए से न देखा जाए, बल्कि इसे धर्म और संस्कृति से जुड़े आंदोलन के रूप में समझा जाए।
अंत में उन्होंने जनता से आग्रह किया कि गौहत्या के विरोध में पूरे समाज को एकजुट होना चाहिए और गौमाता की रक्षा के लिए जागरूकता फैलानी चाहिए।