भारतीय मुद्रा रुपया सोमवार को 89.79 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। यह अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये पर दबाव दो मुख्य कारणों से बढ़ा है विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की लगातार मजबूती।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) पिछले कई दिनों से भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ी, जिसका सीधा असर रुपये की वैल्यू पर पड़ा। इसके अलावा, अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहने की उम्मीद है, जिससे डॉलर इंडेक्स मजबूत बना हुआ है। जब डॉलर शक्तिशाली होता है, तो दुनिया की बाकी मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव भी रुपये में कमजोरी की वजह बन रहे हैं। हालांकि, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) समय-समय पर मुद्रा बाजार में दखल देकर गिरावट को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।
सरकार और आर्थिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी रहती है और डॉलर मजबूत बना रहता है, तो रुपये में निकट भविष्य में भी उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।