दौसा। जिले के सिकराय उपखंड के ग्राम गीजगढ़ के पास स्थित प्राथमिक विद्यालय मखखियों की ढाणी में इस साल एक भी छात्र का नामांकन नहीं हुआ है फिर भी स्कूल में एक प्रधानाध्यापक और एक शिक्षक तैनात हैं। नया शैक्षिक सत्र शुरू होने के चार महीने बीत जाने के बाद भी विद्यालय सुनसान पड़ा हुआ है जिससे स्थानीय लोग और शिक्षा विशेषज्ञ दोनों हैरान और परेशान हैं। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, कुछ वर्ष पहले तक इस स्कूल में बच्चे पढ़ने आते थे पर धीरे-धीरे संख्या घटती गई। रिकॉर्ड बताते हैं कि 2022 में यहाँ 6 विद्यार्थी थे, 2023 में 7 व 2024 में केवल 2 विद्यार्थी नामांकित हुए। लेकिन 2025 में नामांकन शून्य हो गया और विद्यालय में एक भी बच्चा उपस्थित नहीं दिखा। प्रधानाध्यापक महेश शर्मा का कहना है कि उन्होंने आस-पास की ढाणियों में कई बार सर्वे किया और अभिभावकों को बच्चों को जोड़ने के प्रयास किए पर वे अधिकांशत: नज़दीकी निजी या अन्य सरकारी स्कूलों में बच्चों को दाखिल करा रहे हैं।
स्थानीय लोगों और शिक्षा के जानकारों का आरोप है कि ऐसे खाली स्कूलों में तैनात शिक्षकों का वेतन, मिड‑डे मील, सहायिका तथा स्वीपर आदि पर होने वाला मासिक खर्च व्यर्थ जा रहा है। एक उदाहरण के तौर पर जिले के राजपुरा दौसा स्कूल में आठवीं तक 7 शिक्षक हैं जबकि वहाँ कुल विद्यार्थी संख्या केवल 10 ही बताई जाती है ऐसी स्थिति में भी सरकार लाखों रुपए का संचालन खर्च कर रही है। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ओमप्रकाश महावर ने बताया कि शून्य नामांकन की स्थिति के संबंध में प्रधानाध्यापक को दो बार नोटिस दिया जा चुका है। राज्य के नियमों के मुताबिक यदि किसी स्कूल के पास नियर‑बाय स्थित अन्य स्कूलों में बच्चों के जुड़ने से प्रमाणित गिरावट रहती है तो उसे मर्ज किया जा सकता है मखखियों की ढाणी स्कूल के मामले में भी यही संभावना सामने आई है और आगे की औपचारिक कार्रवाई की जा रही है।
विशेषज्ञों का मत है कि केवल स्कूल इमारत का होना पर्याप्त नहीं है बच्चों को फिर से सरकारी विद्यालयों से जोड़ने के लिए स्थानीय जागरूकता, परिवहन की सुविधा, शिक्षण गुणवत्ता और अभिभावकों का भरोसा जरूरी है। उधर ग्रामीणों का कहना है कि दो-तीन छात्रों के आधार पर पढ़ाई का जीवंत वातावरण बनाना मुश्किल होता है इसलिए अभिभावक अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में भेजना पसंद कर रहे हैं। इस घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की रणनीतियों पर बहस तेज कर दी है सवाल यह उठ रहे हैं कि सरकारी नीतियाँ और योजनाएँ जमीन पर किस हद तक व्यवहार्य हैं और किस तरह से ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को पुनः सरकारी शिक्षा प्रणाली से जोड़ा जा सकता है।