पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी के एक बागी गुट ने नेतृत्व को लेकर बड़ा दावा करते हुए ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बागी नेताओं का कहना है कि वे ही तृणमूल कांग्रेस के वास्तविक प्रतिनिधि हैं और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की जरूरत है।
ऋताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले इस गुट ने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को पार्टी अध्यक्ष घोषित करने का दावा किया है। इसके साथ ही बागी गुट ने अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव पद से हटाने की घोषणा भी की है। इस कदम को टीएमसी के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष का नया चरण माना जा रहा है।
बागी नेताओं का आरोप है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसका पुनर्गठन नहीं किया गया। इसी आधार पर उन्होंने नई कार्यकारिणी गठित करने और नए नेतृत्व का चयन करने की बात कही है। उनका दावा है कि संगठन को संविधान के अनुरूप चलाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
दूसरी ओर ममता बनर्जी समर्थक खेमे ने इन दावों को खारिज करते हुए पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक और अवैध बताया है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, नेतृत्व परिवर्तन संबंधी किसी भी निर्णय को आधिकारिक मान्यता तभी मिल सकती है जब वह पार्टी संविधान और निर्धारित संगठनात्मक प्रक्रियाओं के अनुरूप हो।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विवाद और गहराता है तो मामला संगठनात्मक वैधता, नेतृत्व अधिकार और चुनाव आयोग तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाएगा कि पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर किस पक्ष का अधिकार माना जाएगा। हालांकि इस तरह के मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर ही तय होता है।
फिलहाल टीएमसी के भीतर जारी यह टकराव पश्चिम बंगाल की राजनीति का प्रमुख विषय बन गया है। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व, बागी गुट और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों पक्षों के बीच समझौते की कोई संभावना बनती है या फिर यह विवाद और अधिक गहराता है।