विन न्यूज़ नेटवर्क। महाराष्ट्र के नासिक में अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की पूर्व कर्मचारी निदा खान को जमानत दे दी है। अदालत ने उनकी पांच महीने की गर्भावस्था को राहत देने का महत्वपूर्ण आधार माना। अदालत ने 75 हजार रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर उनकी रिहाई का आदेश दिया।
अदालत ने क्या कहा?
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के. जी. जोशी ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी महिला के लिए जेल में बच्चे को जन्म देना और उससे जुड़ा सामाजिक दबाव बेहद कठिन स्थिति होती है। उन्होंने न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए कहा कि नवजात शिशु के हितों और महिला की परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। आदेश में भगवान कृष्ण के कारागार में जन्म की कथा का भी उल्लेख किया गया।
मई में हुई थी गिरफ्तारी
निदा खान को 7 मई को छत्रपति संभाजीनगर स्थित एक किराए के फ्लैट से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार वह लगभग 25 दिनों तक फरार रही थीं। उनकी ओर से दायर जमानत याचिका में गर्भावस्था को प्रमुख आधार बनाया गया था। अदालत ने यह भी माना कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए आगे न्यायिक हिरासत की आवश्यकता नहीं है।
सरकारी पक्ष ने किया विरोध
सरकारी वकील ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि जांच के दौरान यौन उत्पीड़न और धार्मिक दबाव से संबंधित पर्याप्त साक्ष्य सामने आए हैं। वहीं बचाव पक्ष के वकील राहुल कसलीवाल ने अदालत में तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल निर्दोष हैं और उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है। उन्होंने बताया कि अप्रैल में नौकरी से हटाए जाने से पहले निदा खान टीसीएस में एसोसिएट पद पर कार्यरत थीं।
नौ मामलों की जांच जारी
देवलाली कैंप पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में पुलिस टीसीएस की नासिक इकाई में महिला कर्मचारियों के कथित शोषण, छेड़छाड़, मानसिक उत्पीड़न और जबरन धर्मांतरण के प्रयासों से जुड़े कुल नौ मामलों की जांच कर रही है। शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से होने के कारण आरोपियों पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराएं भी लगाई गई हैं।
जांच एजेंसियों के आरोप
जांच एजेंसियों के अनुसार निदा खान पर आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता को बुर्का और धार्मिक साहित्य उपलब्ध कराया। साथ ही मोबाइल फोन में इस्लाम से संबंधित एप्लिकेशन इंस्टॉल कराने, घर जाकर नमाज पढ़ने का तरीका समझाने और हिजाब पहनने के लिए प्रेरित करने के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निर्णय अदालत में सुनवाई और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही होगा। फिलहाल अदालत ने केवल जमानत याचिका पर फैसला सुनाया है, जबकि मामले की मुख्य सुनवाई आगे जारी रहेगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जमानत मिलने का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है। अब जांच एजेंसियों द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों और अदालत में होने वाली आगे की कार्यवाही पर इस मामले की दिशा तय होगी।