रूसी तेल पर भारत की निर्भरता: अमेरिका के दबाव में पूरी तरह रोकना होगा महंगा

Vin News Network
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अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत रूस से तेल पर निर्भर, रोकना होगा महंगा और चुनौतीपूर्ण

अमेरिका और भारत के बीच चल रही ट्रेड डील में रूस से तेल की खरीद एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से कहा है कि वह रूस से तेल खरीदना बंद करे और अमेरिका और वेनेजुएला से तेल की आपूर्ति बढ़ाए। इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा, तो अमेरिका 25 प्रतिशत टैरिफ फिर से लागू कर सकता है।

हालांकि जानकारों का मानना है कि भारत के लिए रूस से तेल का आयात पूरी तरह रोकना आसान नहीं होगा। आर्थिक और तकनीकी कारणों से भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। पिछले कुछ महीनों में भारत ने रूसी तेल की खरीद में थोड़ी कमी जरूर की है, लेकिन पूरी तरह से बंद करने की संभावना फिलहाल कम है।

भारत ने कुछ कदम उठाए
भारतीय तेल रिफाइनरी कंपनियां जैसे इंडियन ऑइल और एचपीसीएल अब वेनेजुएला से तेल मंगवाना शुरू कर चुकी हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूस से तेल खरीद रोक दी है और वेनेजुएला से तेल का बड़ा ऑर्डर किया है। भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत विदेशों से पूरा करता है, जिसमें से एक तिहाई हिस्सा पहले रूस से आता था। पिछले साल नवंबर में अमेरिका ने रूस के प्रमुख तेल निर्यातकों पर प्रतिबंध लगाया और भारत पर 500 प्रतिशत टैरिफ की चेतावनी दी। इसके बाद भारत ने रूसी तेल की खरीद में कटौती शुरू की।

रूस का तेल क्यों अहम
रूस का यूराल कच्चा तेल भारत के लिए विशेष महत्व रखता है। अमेरिकी शेल ऑयल हल्का और गैस कंडेनसेट जैसा होता है, जबकि रूसी तेल भारी और सल्फर वाला है। इसका मतलब यह है कि अगर भारत अमेरिकी तेल को सीधे रूस के तेल की जगह उपयोग करता है, तो रिफाइनरियों को इसे अन्य ग्रेड के तेल के साथ मिलाना पड़ेगा, जिससे उत्पादन लागत बढ़ेगी।

सिर्फ तकनीकी कारण ही नहीं, कीमत भी बड़ी भूमिका निभाती है। रूस लगातार तेल पर छूट दे रहा है। पहले प्रति बैरल 7-8 डॉलर की छूट थी, जो अब बढ़कर 11 डॉलर हो गई है। वहीं, अमेरिकी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए महंगा है और अमेरिका से तेल लाने में समय और परिवहन खर्च भी अधिक आता है। विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी तेल के कारण भारतीय रिफाइनरियों को प्रति बैरल लगभग 7 डॉलर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा।

राजनीतिक और व्यावसायिक चुनौती
विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय रिफाइनरियां तकनीकी रूप से यूराल तेल के बिना काम कर सकती हैं, लेकिन रूस से तेल की खरीद को अचानक बंद करना व्यावसायिक रूप से चुनौतीपूर्ण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील होगा। भारत और रूस के बीच लंबे समय से ऊर्जा साझेदारी रही है, और रिफाइनरियों को तत्काल आपूर्ति विकल्प ढूंढना कठिन हो सकता है।

रूसी तेल की कीमत और गुणवत्ता के कारण भारत के लिए इसे पूरी तरह से छोड़ना न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदायक होगा, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी चुनौतीपूर्ण साबित होगा। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि भारत रूस से तेल की खरीद को धीरे-धीरे कम कर सकता है, लेकिन पूरी तरह बंद करना फिलहाल व्यावहारिक नहीं लगता।

अमेरिकी दबाव के बावजूद, भारत के लिए रूस से तेल खरीदना पूरी तरह रोकना कठिन है। तकनीकी, आर्थिक और आपूर्ति श्रृंखला की वजहों से भारत को रणनीतिक रूप से विकल्पों पर काम करना पड़ेगा। इसके लिए वेनेजुएला और अमेरिका से तेल आयात बढ़ाना शुरू हो चुका है, लेकिन रूस को पूरी तरह छोड़ना फिलहाल भारत के लिए महंगा और चुनौतीपूर्ण विकल्प होगा।

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