भारत ने चीन के उस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है कि उसने भारत और पाकिस्तान के बीच इस साल हुई सैन्य टकराव के दौरान किसी प्रकार की मध्यस्थता की थी। भारत का कहना है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद दोनों देशों के बीच हुई युद्धविराम समझौता पूरी तरह द्विपक्षीय था और इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं थी।
भारत ने स्पष्ट किया है कि युद्धविराम की प्रक्रिया केवल दोनों देशों के डाइरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) के बीच हुई बातचीत से तय हुई। पाकिस्तान ने युद्धविराम की पहल की थी और DGMO के माध्यम से सीधे भारत से संपर्क कर समझौता करने का अनुरोध किया। भारत ने बार-बार यह दोहराया कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की जरूरत नहीं थी।
विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी कि युद्धविराम की सटीक तिथि, समय और शर्तें दोनों देशों के DGMO के बीच फोन संवाद के जरिए तय की गई थीं। यह कॉल 10 मई 2025 को दोपहर 3:35 बजे शुरू हुई थी और इसी बातचीत के परिणामस्वरूप युद्धविराम समझौता लागू हुआ।
भारत का यह रुख यह दर्शाता है कि किसी भी द्विपक्षीय सुरक्षा मामले में तीसरे पक्ष की हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इस प्रक्रिया ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों की सैन्य और कूटनीतिक टीमों के बीच प्रत्यक्ष संवाद के जरिए ही तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह रुख अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अपनी संप्रभुता और नियंत्रण बनाए रखने का संकेत है। किसी बाहरी मध्यस्थता की आवश्यकता केवल सूचना या सलाह तक सीमित रहती है, जबकि वास्तविक निर्णय और समझौता दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष बातचीत से ही होता है।
इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच सीमावर्ती तनाव को नियंत्रित करने की क्षमता दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व में मौजूद है। भारत ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद कोई तीसरा पक्ष युद्धविराम में शामिल नहीं था।
अंततः, भारत ने चीन के दावे का पूरी तरह खंडन करते हुए यह संदेश दिया कि युद्धविराम केवल द्विपक्षीय बातचीत का परिणाम था। यह न केवल भारत की संप्रभुता का प्रतीक है, बल्कि यह दिखाता है कि देश अपनी सुरक्षा और कूटनीति मामलों में पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने का पक्षधर है।