‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत बड़ा फैसला: ट्रंप ने भारत-नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सोलर अलायंस सहित 66 वैश्विक संगठनों से अमेरिका को बाहर किया

Vin News Network
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डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सोलर अलायंस सहित 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को बाहर करने का फैसला किया

अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को एक बार फिर केंद्र में रखते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ा और दूरगामी फैसला लिया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने एक राष्ट्रपति ज्ञापन (Presidential Memorandum) पर हस्ताक्षर कर अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालने का निर्देश दिया है। इनमें संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अहम निकायों के साथ-साथ भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी शामिल है। व्हाइट हाउस ने गुरुवार को इस फैसले की आधिकारिक घोषणा की।

व्हाइट हाउस के अनुसार, यह कदम उन अंतरराष्ट्रीय संगठनों के खिलाफ उठाया गया है जो ट्रंप प्रशासन के मुताबिक अब अमेरिका के राष्ट्रीय हितों की सेवा नहीं करते। इन 66 संगठनों में 35 ऐसे निकाय हैं जो संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध नहीं हैं, जबकि 31 संगठन संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के तहत काम करते हैं। प्रशासन का कहना है कि ये संस्थाएं अमेरिकी संप्रभुता, आर्थिक मजबूती और राष्ट्रीय सुरक्षा के विपरीत काम कर रही हैं।

व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में कहा, “अमेरिका फर्स्ट। आज राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप ने एक राष्ट्रपति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकाला जाएगा, जिनमें 35 गैर-यूएन संगठन और 31 यूएन इकाइयां शामिल हैं।” यह बयान प्रशासन के सख्त रुख को स्पष्ट करता है।

सरकारी बयान के अनुसार, इस ज्ञापन के तहत सभी अमेरिकी कार्यकारी विभागों और एजेंसियों को निर्देश दिया गया है कि वे इन संगठनों में अपनी भागीदारी और वित्तीय सहायता तत्काल समाप्त करें। प्रशासन का आरोप है कि ये संस्थाएं अमेरिकी हितों, सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और संप्रभुता के खिलाफ काम कर रही हैं या फिर अमेरिकी करदाताओं के पैसे का प्रभावी उपयोग करने में विफल रही हैं।

इस फैसले के तहत प्रभावित गैर-यूएन संगठनों में इंटरनेशनल सोलर अलायंस के अलावा कई प्रमुख पर्यावरणीय संस्थाएं भी शामिल हैं। इनमें इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) और इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) जैसे नाम शामिल हैं, जो वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं। ट्रंप प्रशासन लंबे समय से इन संस्थाओं पर “कट्टर जलवायु एजेंडा” को बढ़ावा देने का आरोप लगाता रहा है।

व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संधियों और सम्मेलनों की एक व्यापक समीक्षा के बाद लिया गया है, जिन्हें अमेरिका वित्तीय या नीतिगत समर्थन देता है। प्रशासन का कहना है कि इस समीक्षा में पाया गया कि कई वैश्विक संस्थाएं अमेरिकी स्वतंत्रता को कमजोर करती हैं, ऐसे वैश्विक एजेंडों को आगे बढ़ाती हैं जो अमेरिकी प्राथमिकताओं से टकराते हैं, और करदाताओं के धन को बिना ठोस परिणामों के खर्च करती हैं।

आधिकारिक बयान में कहा गया, “ये निकाय अक्सर वैश्विक एजेंडों को अमेरिकी प्राथमिकताओं से ऊपर रखते हैं। कई मामलों में, वे महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटने में अक्षम या अप्रभावी साबित हुए हैं। ऐसे में अमेरिकी करदाताओं के पैसे का उपयोग घरेलू जरूरतों और राष्ट्रीय हितों के लिए बेहतर तरीके से किया जा सकता है।”

प्रशासन ने यह भी कहा कि 66 संगठनों में से कई ऐसे हैं जो वैश्विक शासन, वैचारिक कार्यक्रमों और कट्टर जलवायु नीतियों को बढ़ावा देते हैं, जो अमेरिका की संप्रभुता और आर्थिक ताकत के खिलाफ हैं। ट्रंप सरकार के मुताबिक, इन संस्थाओं में अमेरिका की भागीदारी से न तो ठोस लाभ मिल रहा है और न ही राष्ट्रीय हित सुरक्षित हो रहे हैं।

व्हाइट हाउस के अनुसार, इन संगठनों से बाहर निकलने से अमेरिका का वित्तीय बोझ कम होगा और संघीय संसाधनों को घरेलू प्राथमिकताओं की ओर मोड़ा जा सकेगा। इनमें बुनियादी ढांचे का विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना शामिल है। यह फैसला ट्रंप प्रशासन की उस नीति के अनुरूप है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की जगह घरेलू हितों को प्राथमिकता दी जाती है।

बयान में कहा गया, “इन संगठनों से बाहर निकलने का मतलब उन इकाइयों को अमेरिकी करदाताओं का पैसा देना बंद करना है, जो अमेरिकी हितों के खिलाफ काम करती हैं या जिनकी कार्यप्रणाली अप्रभावी है। इससे संसाधनों को उन क्षेत्रों में लगाया जा सकेगा, जहां वे अमेरिकी जनता के लिए वास्तविक लाभ दे सकें।”

इंटरनेशनल सोलर अलायंस से अमेरिका का बाहर होना भारत और फ्रांस के लिए कूटनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है। यह संगठन सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने के लिए बनाया गया था। अमेरिका की भागीदारी से इसे वैश्विक स्तर पर मजबूती मिली थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े बहुपक्षीय मंचों को लेकर शुरू से ही संदेहात्मक रुख अपनाता रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले भी पेरिस जलवायु समझौते जैसे वैश्विक समझौतों से अमेरिका को बाहर निकाल चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि ऐसे समझौते अमेरिकी उद्योगों और नौकरियों को नुकसान पहुंचाते हैं और देश की आर्थिक प्रतिस्पर्धा को कमजोर करते हैं। मौजूदा फैसला उसी सोच का विस्तार माना जा रहा है।

व्हाइट हाउस के बयान में कहा गया, “राष्ट्रपति ट्रंप ने हमेशा अमेरिकी संप्रभुता की रक्षा के लिए संघर्ष किया है और यह सुनिश्चित किया है कि अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी सीधे तौर पर अमेरिकी हितों की सेवा करे।” प्रशासन का कहना है कि यह कदम अमेरिका को उन वैश्विक ढांचों से मुक्त करेगा जो देश की नीति निर्धारण की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।

आलोचकों का मानना है कि इस फैसले से अमेरिका वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ सकता है और जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण तथा वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग कमजोर हो सकता है। इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन अपने फैसले पर अडिग है और इसे अमेरिकी हितों की जीत के रूप में पेश कर रहा है।

66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने का यह फैसला ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को और आक्रामक रूप में सामने लाता है। यह न सिर्फ अमेरिका की वैश्विक भूमिका को पुनर्परिभाषित करता है, बल्कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं की दिशा पर भी गहरा असर डाल सकता है।

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