‘सिर्फ निःसंतान होना तलाक का आधार नहीं’- पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी को ₹34.76 लाख गुजारा भत्ता देने का आदेश

Vin News Network
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पटना हाईकोर्ट

विन न्यूज़ नेटवर्क। पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ निःसंतान (Childlessness) या बांझपन (Infertility) किसी विवाह को समाप्त करने का कानूनी आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि यदि पति-पत्नी वर्षों तक संतान प्राप्ति के लिए इलाज कराते रहे हों और प्रयास करते रहे हों, तो केवल बच्चे का जन्म न होना विवाह विच्छेद का कारण नहीं माना जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में पति-पत्नी के बीच आपसी विश्वास पूरी तरह समाप्त हो चुका था, दोनों लंबे समय से अलग रह रहे थे, गंभीर आरोप-प्रत्यारोप लगे और सुलह के कई प्रयास असफल रहे। ऐसे में मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) के आधार पर फैमिली कोर्ट द्वारा दिया गया तलाक का फैसला सही है।

पत्नी की अपील खारिज, फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार

यह मामला एक महिला द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के तलाक संबंधी फैसले को चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई जस्टिस चंद्रशेखर झा और बिबेक चौधरी की खंडपीठ ने की।

सभी तथ्यों और सबूतों का मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि विवाह इस स्थिति तक पहुंच चुका था, जहां रिश्ते को सामान्य रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं रह गया था।

2010 में हुई थी शादी, वर्षों तक कराया IVF इलाज

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की शादी 12 जून 2010 को हुई थी। विवाह के बाद कई वर्षों तक संतान न होने पर दंपति ने विभिन्न डॉक्टरों से इलाज कराया और IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) सहित कई चिकित्सा प्रक्रियाओं का सहारा लिया।

मेडिकल दस्तावेजों से यह स्पष्ट हुआ कि पति और पत्नी दोनों ही संतान पाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। अदालत ने कहा कि इलाज के दौरान दोनों ने सक्रिय रूप से सहयोग किया और एक-दूसरे पर इलाज न कराने का आरोप सही नहीं पाया गया।

‘बांझपन नहीं, मानसिक क्रूरता बनी तलाक की वजह’

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बच्चे का न होना इस दंपति के वैवाहिक तनाव का एक कारण जरूर था, लेकिन तलाक का वास्तविक आधार मानसिक क्रूरता रहा।

अदालत ने कहा कि वर्षों तक चले विवाद, लगातार आरोप-प्रत्यारोप, आपसी भरोसे का खत्म होना, लंबा अलगाव और गंभीर आपराधिक मुकदमों ने रिश्ते को इस स्तर तक पहुंचा दिया, जहां विवाह को बचाना संभव नहीं रह गया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर निःसंतान दंपति के मामले में तलाक का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

दहेज और उत्पीड़न के आरोप भी पहुंचे अदालत

मामले के दौरान पत्नी ने वर्ष 2018 में पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज प्रताड़ना, मारपीट, हत्या के प्रयास और उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए आपराधिक मामला दर्ज कराया था।

महिला का आरोप था कि उस पर बच्चा न होने के कारण पति की दूसरी शादी कराने का दबाव बनाया जा रहा था। दूसरी ओर पति ने इन सभी आरोपों को निराधार बताया।

हाईकोर्ट ने कहा कि कई वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया में आरोप सिद्ध नहीं हो सके। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले में आरोप सिद्ध न होने का अर्थ यह नहीं होता कि शिकायतकर्ता ने जानबूझकर झूठे आरोप लगाए थे।

रिश्ता पूरी तरह टूट चुका था: हाईकोर्ट

पीठ ने कहा कि इस मामले में लंबे समय तक अलग रहना, सुलह के कई प्रयासों का असफल होना, आपसी विश्वास का पूरी तरह समाप्त हो जाना और लगातार कानूनी विवाद यह दर्शाते हैं कि वैवाहिक संबंध अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुके थे।

अदालत ने कहा कि विवाह केवल कानूनी बंधन नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सम्मान पर आधारित संबंध है। जब यह आधार समाप्त हो जाता है, तब रिश्ते को जबरन बनाए रखना दोनों पक्षों के हित में नहीं होता।

पत्नी को ₹34.76 लाख स्थायी गुजारा भत्ता

हाईकोर्ट ने तलाक का फैसला बरकरार रखते हुए पति को पत्नी को 34 लाख 76 हजार रुपये स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) देने का निर्देश दिया।

अदालत ने पति की आय और संपत्ति से जुड़े हलफनामे का अध्ययन किया। रिकॉर्ड के अनुसार, पति एक सरकारी स्कूल में सहायक शिक्षक है और उसकी मासिक आय लगभग 86,900 रुपये है।

इसी आधार पर अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पत्नी को स्थायी आर्थिक सहायता देने का आदेश पारित किया।

दो किस्तों में देना होगा भुगतान

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि गुजारा भत्ते की पहली किस्त आदेश की जानकारी मिलने के 15 दिनों के भीतर दी जाएगी। दूसरी किस्त पहली किस्त के 60 दिनों के भीतर अदा करनी होगी।

यदि पति निर्धारित समय में राशि का भुगतान नहीं करता है तो पत्नी कानून के तहत इसकी वसूली के लिए उचित कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पटना हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि निःसंतान होना अपने आप में तलाक का आधार नहीं है, जबकि मानसिक क्रूरता, आपसी विश्वास का पूरी तरह खत्म होना और रिश्ते का अपरिवर्तनीय रूप से टूट जाना तलाक के महत्वपूर्ण आधार हो सकते हैं।

यह फैसला यह भी संदेश देता है कि अदालतें वैवाहिक विवादों में केवल एक कारण नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद ही निर्णय देती हैं।

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