भारत में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बायोरिमेडिएशन: सूक्ष्मजीवों से प्राकृतिक सफाई

Vin News Network
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भारत में प्रदूषण कम करने के लिए बायोरिमेडिएशन तकनीक का उपयोग

बायोरिमेडिएशन एक ऐसी पर्यावरणीय तकनीक है, जिसमें सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टीरिया, कवक, शैवाल और पौधों की मदद से प्रदूषकों को प्राकृतिक और सुरक्षित पदार्थों में बदल दिया जाता है। यह तकनीक कीटनाशक, भारी धातुएँ, प्लास्टिक और औद्योगिक अपशिष्ट जैसे हानिकारक पदार्थों को मिट्टी, जल और वायु से हटाने में प्रभावी साबित होती है। भारत में बढ़ते औद्योगिकीकरण और उद्योगों के कारण पर्यावरण पर भारी दबाव पड़ रहा है। नदियों में औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट का लगातार प्रवाह, मिट्टी का नुकसान और वायु प्रदूषण गंभीर समस्याएँ पैदा कर रही हैं। पारंपरिक तरीके जैसे रासायनिक या भौतिक उपचार महंगे, ऊर्जा-गहन और कभी-कभी प्रदूषकों को दूसरे रूप में स्थानांतरित कर देते हैं। ऐसे में बायोरिमेडिएशन एक सुरक्षित, किफायती और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है।

बायोरिमेडिएशन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है। पहला है स्थल पर उपचार या इन-सिटू बायोरिमेडिएशन, जिसमें प्रदूषित स्थल पर ही सूक्ष्मजीव या पौधों का उपयोग कर प्रदूषण को कम किया जाता है। उदाहरण के लिए तेल फैलाव या प्रदूषित मिट्टी को उसी स्थान पर माइक्रोबियल उपचार से साफ किया जाता है। दूसरा है स्थल से बाहर उपचार या एक्स-सिटू बायोरिमेडिएशन, जिसमें मिट्टी या जल को निकालकर नियंत्रित वातावरण में, जैसे बायोरिएक्टर में, उपचार किया जाता है और फिर वापस लाया जाता है। इसके अलावा जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके जीन परिवर्तित सूक्ष्मजीव तैयार किए जा सकते हैं, जो प्लास्टिक, कीटनाशक और अन्य जटिल रसायनों को अधिक तेजी से नष्ट कर सकते हैं।

भारत में बायोरिमेडिएशन के कई प्रयास चल रहे हैं। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के क्लीन टेक्नोलॉजी प्रोग्राम के तहत विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और उद्योग इस क्षेत्र में जुड़े हुए हैं। CSIR के नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं के माध्यम से बायोरिमेडिएशन के उपाय विकसित करता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) तेल फैलाव रोकने और मिट्टी सुधारने के लिए सूक्ष्मजीव आधारित यौगिक विकसित कर रहे हैं। इसके साथ ही स्टार्टअप्स जैसे Biotech Consortium India Limited और Ecominr India भी मिट्टी और जल के लिए माइक्रोबियल समाधान प्रदान कर रहे हैं।

अन्य देशों में भी बायोरिमेडिएशन का प्रयोग सफलतापूर्वक हो रहा है। जापान शहरी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में माइक्रोब और पौधों का संयोजन करता है। यूरोपीय संघ ने कई परियोजनाओं को वित्तपोषित किया है जो तेल फैलाव, विषाक्त पदार्थों की सफाई और खनन स्थलों की पुनर्स्थापना करती हैं। चीन ने मिट्टी प्रदूषण नियंत्रण में बायोरिमेडिएशन को प्राथमिकता दी है और औद्योगिक अपशिष्ट के लिए जीन परिवर्तित बैक्टीरिया का प्रयोग कर रहा है।

हालांकि बायोरिमेडिएशन में चुनौतियाँ भी हैं। जीन परिवर्तित सूक्ष्मजीवों के पर्यावरणीय प्रभाव पर सावधानी बरतनी जरूरी है। इसके अलावा भारत में राष्ट्रीय मानक, बायोसुरक्षा प्रोटोकॉल और प्रशिक्षित कर्मियों की कमी है। लोगों में माइक्रोबियल तकनीकों के प्रति जागरूकता कम होने के कारण इसका प्रयोग धीमा रह सकता है। इसे सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि भारत में मानक विकसित किए जाएँ, क्षेत्रीय बायोरिमेडिएशन केंद्र बनाए जाएँ और इसे सरकारी योजनाओं जैसे नमामि गंगे और स्वच्छ भारत मिशन से जोड़ा जाए।

यदि सही तरीके से लागू किया जाए तो बायोरिमेडिएशन भारत में प्रदूषण नियंत्रण का एक प्रभावी, टिकाऊ और वैज्ञानिक समाधान साबित हो सकता है। यह न केवल पर्यावरण को सुरक्षित करेगा, बल्कि जैव प्रौद्योगिकी और रोजगार के अवसर भी बढ़ाएगा। बायोरिमेडिएशन को मुख्यधारा की नीति और औद्योगिक अनुपालन में शामिल कर भारत में प्रदूषण मुक्त और स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।

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