विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित इक्वैलिटी प्रमोशन रेगुलेशंस इन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस, 2026 को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि नए नियमों के तहत किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कानून के दुरुपयोग की अनुमति नहीं दी जाएगी और इसका निष्पक्ष क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाएगा। मंत्री की यह टिप्पणी यूजीसी मुख्यालय के बाहर हुए विरोध प्रदर्शनों और देशभर में बढ़ती बहस के बीच आई है।
शिक्षा मंत्री का बयान
मीडिया से बातचीत में धर्मेंद्र प्रधान ने कहा,
“मैं सभी को आश्वस्त करता हूं कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा और कोई भी इस कानून का दुरुपयोग नहीं कर सकेगा।”
उन्होंने कहा कि यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और समानता को बढ़ावा देना है। मंत्री ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से आग्रह किया कि वे नियमों को जिम्मेदारी के साथ लागू करें, ताकि शैक्षणिक माहौल सुरक्षित और गरिमापूर्ण बना रहे।
यूजीसी 2026 नियमों की पृष्ठभूमि
यूजीसी ने 15 जनवरी 2026 को इक्वैलिटी प्रमोशन रेगुलेशंस इन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस, 2026 को अधिसूचित किया था। यूजीसी के अनुसार, इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और छात्रों, शिक्षकों तथा गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए एक समावेशी और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करना है।
यह नया ढांचा देश की उच्च शिक्षा प्रणाली में समानता, गुणवत्ता और जवाबदेही को मजबूत करने के लिए तैयार किया गया है।
ओबीसी को औपचारिक रूप से शामिल किया गया
इन नियमों के तहत एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में औपचारिक रूप से शामिल किया गया है। अब तक संस्थागत स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़ी शिकायतों पर केंद्रित थे।
नए प्रावधानों के अनुसार, ओबीसी वर्ग के छात्र और कर्मचारी भी उत्पीड़न या भेदभाव की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। यूजीसी का कहना है कि यह कदम जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।
संस्थागत ढांचे में अनिवार्य बदलाव
नियमों के तहत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में एक इक्वैलिटी कमेटी का गठन अनिवार्य किया गया है। इस समिति में ओबीसी, महिलाएं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दिव्यांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व होना आवश्यक है।
यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट यूजीसी को सौंपेगी। यूजीसी के अनुसार, इससे पारदर्शिता, निगरानी और संस्थागत जवाबदेही को बढ़ावा मिलेगा।
विरोध और समर्थन दोनों
यूजीसी 2026 नियमों को कुछ वर्गों ने सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है, जबकि कई उच्च जाति संगठनों ने इसका विरोध किया है। विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों का दुरुपयोग हो सकता है और इससे झूठी शिकायतों की आशंका है।
जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और विभिन्न वैश्य संगठनों ने सवर्ण समाज समन्वय समिति (एस-4) के बैनर तले इन नियमों का विरोध किया है।
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा चर्चा में है। कुछ यूट्यूबर्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे “सवर्ण विरोधी” करार दिया है, जबकि सामाजिक न्याय के समर्थकों ने इसे लंबे समय से आवश्यक सुधार बताया है।
यूजीसी के आंकड़े और तर्क
यूजीसी ने अपने पक्ष में आंकड़े भी पेश किए हैं। संसद और सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में पिछले पांच वर्षों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
वर्ष 2019-20 में जहां 173 शिकायतें दर्ज की गई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई। इस अवधि में 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों से कुल 1,160 शिकायतें प्राप्त हुईं। यूजीसी का कहना है कि ये आंकड़े मजबूत संस्थागत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता को दर्शाते हैं।