भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते को लेकर देश की राजनीति में तीखी बहस छिड़ गई है। शिवसेना (उद्धव गुट) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने इस समझौते को भारत के हितों के खिलाफ बताते हुए इसे ‘सीधा राष्ट्रद्रोह’ करार दिया है। उनका कहना है कि यह डील न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदेह है, बल्कि भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता पर भी सवाल खड़े करती है।
राउत ने 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक रात का जिक्र करते हुए कहा कि जिस ‘नियति से समझौते’ के साथ देश आज़ाद हुआ था, मौजूदा सरकार ने उसी भावना को कमजोर कर दिया है। उनके अनुसार, यह व्यापार समझौता भारत को फिर से परनिर्भरता की ओर धकेलने जैसा है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान किसानों, छोटे व्यापारियों और आम जनता को होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह समझौता जल्दबाजी में किया गया और इसकी घोषणा सबसे पहले अमेरिका की ओर से की गई। राउत के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति और वहां के कृषि मंत्री ने खुलकर बताया कि इस डील से अमेरिका को बड़ा फायदा होगा, लेकिन भारत सरकार ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया कि भारत को इससे क्या ठोस लाभ मिलेगा।
संजय राउत ने टैरिफ संरचना पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले अमेरिका भारत पर औसतन बहुत कम शुल्क लगाता था, लेकिन अब भारतीय निर्यात पर 18 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाएगा। वहीं, भारत अमेरिका से आयात होने वाले कई उत्पादों पर लगभग शून्य शुल्क लगाएगा। इससे भारतीय बाजार में अमेरिकी उत्पाद सस्ते होंगे और घरेलू उद्योगों पर भारी दबाव पड़ेगा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि इस समझौते के चलते भारत को ऊर्जा और तेल के क्षेत्र में भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। रूस से सस्ता तेल छोड़कर अमेरिका और अन्य देशों से महंगा तेल खरीदने की मजबूरी भारत की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालेगी, जिससे लाखों करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।
राउत का कहना है कि इस डील से कुछ चुनिंदा उद्योगों को ही फायदा होता दिख रहा है, जबकि किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर उपलब्ध होंगे, जिससे देश के किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा करना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टार्टअप इंडिया’ और कौशल विकास योजनाओं के भविष्य पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि जब विदेशी उत्पादों के लिए बाजार पूरी तरह खोल दिया जाएगा, तो घरेलू उत्पादन और रोजगार कैसे सुरक्षित रहेंगे।
संजय राउत ने अंत में कहा कि यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक मुद्दा भी है। उनके अनुसार, कोई भी देशभक्त नागरिक इस डील का समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि यह भारत के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ जाती है।