लखनऊ
राजधानी लखनऊ में कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए नगर निगम एक बड़ा बदलाव लाने की तैयारी में है। शहर में संचालित 21 प्रकार के व्यवसायों के लिए अब नगर निगम से वार्षिक लाइसेंस लेना अनिवार्य किया जा सकता है। इस लाइसेंस के लिए व्यापारियों को हर साल शुल्क देना होगा, जिसकी राशि 2 हजार रुपये से लेकर 75 हजार रुपये तक तय की गई है।
नगर निगम इस प्रस्ताव को 27 जनवरी को होने वाली सदन की बैठक में प्रस्तुत करेगा। यदि सदन से प्रस्ताव को स्वीकृति मिल जाती है, तो यह नियम पूरे शहर में लागू हो जाएगा और हजारों व्यापारियों पर इसका सीधा आर्थिक प्रभाव पड़ेगा।
कौन-कौन से कारोबार आएंगे लाइसेंस के दायरे में
नगर निगम के प्रस्ताव के अनुसार, जिम, ब्यूटी पार्लर, कोचिंग संस्थान, चाय की दुकान, कपड़ों के शोरूम, ज्वैलरी शॉप, फर्नीचर दुकान, पेंट्स की दुकान, बिल्डिंग मटेरियल सप्लायर सहित कुल 21 श्रेणियों के व्यवसायों को लाइसेंस लेना होगा। इन सभी व्यवसायों के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित किया गया है, जो कारोबार के प्रकार और सुविधाओं के आधार पर तय किया गया है।
उदाहरण के तौर पर, सामान्य जिम और ब्यूटी पार्लर के लिए शुल्क 4 हजार रुपये रखा गया है, जबकि वातानुकूलित जिम के लिए 10 हजार रुपये और वातानुकूलित ब्यूटी पार्लर के लिए 8 हजार रुपये प्रस्तावित हैं।
ब्रांडेड शोरूम और बड़े कारोबार पर ज्यादा शुल्क
नगर निगम ने बड़े और ब्रांडेड कारोबारों के लिए अधिक लाइसेंस शुल्क तय किया है। ब्रांडेड ज्वैलरी शोरूम को हर साल 20 हजार रुपये, जबकि सामान्य ज्वैलरी की दुकानों को 10 हजार रुपये चुकाने होंगे। इसी तरह ब्रांडेड कपड़ा और जूते के शोरूम के लिए 8-8 हजार रुपये का शुल्क प्रस्तावित किया गया है।
स्पोर्ट्स एकेडमी के लिए भी शुल्क तय किया गया है। एक खेल की स्पोर्ट्स एकेडमी को 10 हजार रुपये और एक से अधिक खेलों की एकेडमी को 20 हजार रुपये सालाना लाइसेंस शुल्क देना होगा।
टी-स्टाल से लेकर बेकरी फैक्ट्री तक शामिल
इस प्रस्ताव में छोटे कारोबारियों को भी शामिल किया गया है। चाय की दुकान (टी-स्टाल) के लिए 2 हजार रुपये का लाइसेंस शुल्क तय किया गया है, जबकि बेकरी फैक्ट्री के लिए 10 हजार रुपये शुल्क प्रस्तावित है। फैब्रिकेटर्स से 5 हजार रुपये और आरा मशीन संचालकों से 15 हजार रुपये वार्षिक शुल्क लिया जाएगा।
बिल्डिंग मटेरियल की दुकानों को 10 हजार रुपये, पेंट्स की दुकानों को 8 हजार रुपये और फर्नीचर शॉप को 6 हजार रुपये सालाना देने होंगे।
सबसे ज्यादा शुल्क कंपोजिट शॉप पर
प्रस्ताव में सबसे अधिक लाइसेंस शुल्क कंपोजिट शॉप (जहां अंग्रेजी शराब और बीयर दोनों की बिक्री होती है) के लिए रखा गया है। ऐसी दुकानों को हर साल 75 हजार रुपये का लाइसेंस शुल्क नगर निगम को देना होगा।
ऑटो, टेंपो और ई-रिक्शा चालक भी आएंगे दायरे में
इस प्रस्ताव की एक अहम और चर्चा में रहने वाली बात यह है कि केवल दुकानें और शोरूम ही नहीं, बल्कि ऑटो, टेंपो और ई-रिक्शा चालकों को भी नगर निगम से लाइसेंस लेना होगा। निगम का कहना है कि इससे शहर में यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी और अव्यवस्थित संचालन पर रोक लगाई जा सकेगी।
नगर निगम का तर्क: व्यवस्था और गुणवत्ता में सुधार
नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि इस लाइसेंस प्रणाली का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं है, बल्कि शहर में व्यवस्थित व्यापारिक संचालन सुनिश्चित करना है। निगम के अनुसार, लाइसेंस व्यवस्था लागू होने से अवैध और अनियंत्रित कारोबार पर अंकुश लगेगा, सेवाओं की गुणवत्ता सुधरेगी और उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी।
पहले मांगी गई थीं आपत्तियां और सुझाव
नगर निगम ने इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले व्यापारियों और आम नागरिकों से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए थे। निगम का दावा है कि सभी संबंधित व्यवसायों को अपनी राय रखने का पूरा अवसर दिया गया था।
निगम अधिकारियों का कहना है कि विरोध करने वाले कई व्यापारी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी आपत्तियां दर्ज कराने नहीं पहुंचे।
कम आपत्तियों को लेकर निगम का पक्ष
नगर निगम के अनुसार, पूरे शहर से केवल दो व्यापारिक संगठनों और 14 चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ने ही इस प्रस्ताव पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। निगम का मानना है कि इतनी कम संख्या में आपत्तियां आने से यह संकेत मिलता है कि अधिकांश लोग या तो प्रस्ताव से सहमत थे या उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया।
व्यापारियों में मिली-जुली प्रतिक्रिया
हालांकि प्रस्ताव अभी अंतिम रूप में लागू नहीं हुआ है, लेकिन इसे लेकर व्यापारियों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ व्यापारी इसे अनावश्यक आर्थिक बोझ बता रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यदि इससे व्यवस्था सुधरती है तो यह कदम लंबे समय में फायदेमंद हो सकता है।
27 जनवरी की बैठक पर टिकी निगाहें
अब सभी की नजरें 27 जनवरी को होने वाली नगर निगम सदन की बैठक पर टिकी हैं। यदि प्रस्ताव को सदन से मंजूरी मिल जाती है, तो लखनऊ में कारोबार करने का तरीका बदल जाएगा और लाइसेंस लेना हर साल की अनिवार्य प्रक्रिया बन जाएगी।