सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को आवारा कुत्तों की समस्या पर सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी जानवर के व्यवहार को पहले से पढ़ पाना असंभव है जब वह काटने के मूड में हो। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि स्कूल, अस्पताल या न्यायालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आवारा कुत्तों का होना क्यों अनिवार्य है। शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके संशोधित आदेश का दायरा केवल संस्थागत क्षेत्रों तक सीमित है, सार्वजनिक सड़कों और राहगीरों पर यह लागू नहीं होता।
तीन जजों की पीठ – न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजरिया – ने जोर देकर कहा कि जोखिम को रोकना सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल कुत्तों के व्यवहार से यह पहचानना असंभव है कि कौन सा कुत्ता खतरनाक है। उन्होंने यह भी बताया कि सड़कों और गलियों में आवारा कुत्तों की आबादी प्रबंधित करना कितना चुनौतीपूर्ण है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा, “यह सिर्फ काटने की बात नहीं है। कुत्तों की वजह से होने वाले हादसों और दुर्घटनाओं का खतरा भी है। आप कैसे जान सकते हैं कि कौन सा कुत्ता सुबह किस मूड में है?” इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि अदालत आवारा कुत्तों के खतरे को गंभीरता से ले रही है।
अदालत ने नवंबर 2025 में यह नोट किया था कि शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कुत्तों के काटने की घटनाओं में “चिंताजनक वृद्धि” हुई है। इस पर ध्यान देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि ऐसे आवारा कुत्तों को उचित नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित शेल्टर में स्थानांतरित किया जाए।
पीठ ने यह भी कहा कि कुत्तों को उसी स्थान पर वापस छोड़ना होगा, जहां से उन्हें उठाया गया था। इसके साथ ही, राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे से सभी मवेशियों और अन्य आवारा जानवरों को हटाने का भी आदेश दिया गया। यह कदम मुख्य रूप से सड़क दुर्घटनाओं और आम जनता के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से है।
हालांकि, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि रेबीज से संक्रमित या संभावित रूप से संक्रमित कुत्तों पर यह स्थानांतरण लागू नहीं होगा। ऐसे कुत्तों को विशेष सावधानी के साथ संभालना होगा ताकि मानव स्वास्थ्य पर कोई खतरा न पैदा हो।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय प्रशासन और पशु कल्याण संगठनों को निर्देश दिया कि वे संस्थागत क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की स्थिति पर कड़ी निगरानी रखें और उनकी सुरक्षा के साथ-साथ मानव सुरक्षा सुनिश्चित करें। न्यायालय ने यह भी कहा कि आवारा कुत्तों को मारना समाधान नहीं है और उनकी प्रजनन और टीकाकरण पर ध्यान देना ज़रूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ती जा रही है और शहरी क्षेत्रों में उनके कारण सड़क दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि हो रही है। अदालत का आदेश यह सुनिश्चित करता है कि आवारा कुत्तों को मानव सुरक्षा के दृष्टिकोण से व्यवस्थित किया जाए, जबकि उनके अधिकारों का संरक्षण भी किया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय की इस कार्रवाई को पशु अधिकार संगठनों ने स्वागत किया है, क्योंकि यह आवारा कुत्तों की सुरक्षा और उन्हें इंसानी तरीके से प्रबंधित करने पर जोर देती है। वहीं, नागरिकों के लिए यह आदेश सुरक्षा का संदेश भी है कि संवेदनशील क्षेत्रों में आवारा कुत्तों से संभावित खतरे को गंभीरता से लिया जाएगा।
अदालत की स्पष्ट राय यह है कि संवेदनशील संस्थानों में आवारा कुत्तों की उपस्थिति न केवल छात्रों, मरीजों और आगंतुकों के लिए खतरा बन सकती है, बल्कि कर्मचारियों के लिए भी जोखिम बढ़ा सकती है। इसलिए, प्रशासन और स्थानीय निकायों को इसे गंभीरता से लेने और आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह दोहरा दिया कि आवारा कुत्तों की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इसे मानवीय दृष्टिकोण के साथ प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना आवश्यक है।