सुरेखा यादव की कहानी भारत की उन चुनिंदा कहानियों में से है, जो यह साबित करती हैं कि अगर मन में हिम्मत और सपनों को पूरा करने का जुनून हो, तो इंसान किसी भी सीमित सोच को तोड़ सकता है। सुरेखा यादव एशिया की पहली महिला लोको पायलट हैं, यानी पूरे एशिया में सबसे पहले ट्रेन का इंजन चलाने वाली महिला। आज यह बात आम लग सकती है, लेकिन जब उन्होंने यह काम शुरू किया, तब समाज में यह माना जाता था कि ट्रेन चलाना सिर्फ पुरुषों का काम है। महिलाएँ यह जिम्मेदारी नहीं संभाल सकतीं। उस समय ट्रेन का इंजन एक तरह से “पुरुषों का क्षेत्र” माना जाता था, लेकिन सुरेखा यादव ने अपने साहस, मेहनत और विश्वास से यह साबित कर दिया कि प्रतिभा और क्षमता किसी लिंग की मोहताज नहीं होती।
सुरेखा का जन्म 2 सितंबर 1965 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके घर में ज्यादा साधन नहीं थे, लेकिन माता-पिता ने बेटियों को अच्छे संस्कार और मेहनत का महत्व सिखाया। बचपन से ही सुरेखा कुछ अलग थीं। उन्हें गुड्डे-गुड़ियों वाले खेलों से ज़्यादा मशीनों में रुचि थी। वे अक्सर यह जानने की कोशिश करतीं कि चीज़ें कैसे काम करती हैं। यह रुचि धीरे-धीरे उनके भविष्य का रास्ता तय करने वाली थी। स्कूल में वे पढ़ाई में अच्छी थीं और विज्ञान के विषयों में विशेष रुचि रखती थीं। अपने परिवार और शिक्षकों के समर्थन से उन्होंने 12वीं के बाद इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने का फैसला किया। उन्होंने सरकारी पॉलिटेक्निक, कराड से अपना डिप्लोमा पूरा किया।
डिप्लोमा के बाद भारतीय रेलवे में भर्ती निकली और सुरेखा ने आवेदन कर दिया। उनकी मेहनत रंग लाई और वे रेलवे में सहायक लोको पायलट चुनी गईं। लेकिन नौकरी मिलना ही पूरा सफर नहीं था। असली चुनौती तो अब शुरू होने वाली थी। रेलवे ट्रेनिंग बहुत कठिन होती है लंबी शिफ्टें, तकनीकी ज्ञान, भारी इंजन को समझने की जिम्मेदारी और हमेशा सतर्क रहना। उस समय महिलाएँ इस काम की कल्पना भी नहीं करती थीं। रेलवे में भी वरिष्ठ कर्मचारी सोचते थे कि एक महिला इतना कठिन काम कैसे संभालेगी? लेकिन सुरेखा ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने हर चुनौती को सीखने का मौका माना।
धीरे-धीरे उन्होंने ट्रेन इंजन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी सीख ली सिग्नलिंग सिस्टम, ब्रेकिंग तकनीक, इंजन का संचालन, आपात स्थितियों में क्या करना है, यात्रियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करनी है, और भी बहुत कुछ। उनकी लगन इतनी मजबूत थी कि जल्द ही वे बाकी सहकर्मियों से बेहतर प्रदर्शन करने लगीं। वे समय पर, अनुशासित और बेहद ध्यान से काम करने वाली कर्मचारी बन गईं।
फिर आया 1987, वह साल जिसने भारतीय रेलवे के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा। इस साल सुरेखा यादव को पूर्ण रूप से लोको पायलट नियुक्त किया गया। यह सिर्फ उनकी जीत नहीं थी; यह उन सभी महिलाओं की जीत थी, जो समाज की सोच के कारण तकनीकी क्षेत्रों में कदम रखने से डरती थीं। सुरेखा जब पहली बार ट्रेन के इंजन में बैठीं, तब लोगों को यह बात समझ ही नहीं आ रही थी कि एक महिला इतने बड़े इंजन को चला सकती है। कुछ यात्री तो चकित होकर देखते, कुछ को डर भी लगता, लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी और सावधानी से निभाया, सबका भरोसा उन पर बढ़ता गया।
सुरेखा ने अपने करियर में अनेक ट्रेनें चलाईं, लेकिन 2011 में उनकी ज़िंदगी में एक विशेष क्षण आया जब उन्होंने भारत की प्रतिष्ठित डेक्कन क्वीन एक्सप्रेस चलाई। यह ट्रेन महाराष्ट्र की सबसे मशहूर और सबसे सम्मानित ट्रेनों में से एक है। इसे चलाना सिर्फ अनुभव नहीं, बल्कि उच्च स्तर के कौशल की मांग करता है। जब सुरेखा ने सफलतापूर्वक यह ट्रेन चलाई, वे राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हो गईं। यह पल न सिर्फ उनके लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का था।
सुरेखा का जीवन केवल उपलब्धियों से भरा नहीं था; यह संघर्ष और दृढ़ता की कहानी भी है। एक महिला होकर रात की ड्यूटी करना, परिवार संभालना, लंबी-थकाऊ शिफ्टें निभाना आसान नहीं था। कई बार समाज के ताने सुनने पड़ते, कई बार सहकर्मी शक की निगाह से देखते। लेकिन सुरेखा हमेशा मुस्कुराकर काम करती रहीं। वे मानती हैं कि काम की चुनौती ही आपको मजबूत बनाती है।
उन्होंने रेलवे में कई नए मानक स्थापित किए। ट्रेन संचालन में उनकी सुरक्षा और समयपालन की रिकॉर्ड आज भी मिसाल मानी जाती है। उन्होंने डीज़ल, इलेक्ट्रिक और विभिन्न प्रकार के इंजनों पर महारत हासिल की। एक समय ऐसा भी आया जब रेलवे में बहुत सी लड़कियाँ प्रवेश परीक्षा देकर लोको पायलट बनने लगीं। कई युवतियाँ खुद कहती हैं कि अगर सुरेखा मैडम जैसे रोल मॉडल न होते, तो वे कभी इस क्षेत्र में कदम रखने की हिम्मत नहीं करतीं।
अपने शानदार करियर के दौरान सुरेखा को कई सम्मान मिले ‘बेस्ट मोटरमैन अवॉर्ड’, ‘वुमन अचीवर अवॉर्ड’ और कई सामाजिक संगठनों द्वारा विशेष सम्मान। लेकिन वे हमेशा कहती हैं कि सबसे बड़ा पुरस्कार यात्रियों का विश्वास और उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली मुस्कान है।
आज भी सुरेखा यादव भारतीय रेल की सेंट्रल रेलवे में सेवा दे रही हैं। वे न सिर्फ ट्रेन चलाती हैं बल्कि नई पीढ़ी के लोको पायलटों का मार्गदर्शन भी करती हैं। रेलवे में आने वाली लड़कियाँ उन्हें अपना आदर्श मानती हैं। सुरेखा का मानना है कि लड़कियों को किसी भी क्षेत्र में जाने से डरना नहीं चाहिए। वे कहती हैं, “सपनों की राह कठिन जरूर होती है, लेकिन जब आप मेहनत और हिम्मत के साथ चलते हैं, तो मंज़िल खुद रास्ता दिखाती है।”
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में किसी भी चुनौती से डरना नहीं चाहिए, चाहे वह कितनी भी कठिन क्यों न लगे। समाज की सोच बदली जा सकती है, अगर आप खुद पर विश्वास रखते हैं। आज जब महिलाएँ पायलट बन रही हैं, इंजीनियर बन रही हैं, सेना में जा रही हैं, खेलों में नए रिकॉर्ड बना रही हैं तो उनमें सुरेखा यादव जैसी नायिकाओं का बड़ा योगदान है।
सुरेखा यादव सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि ट्रेन का इंजन हो या जीवन की पटरियाँ अगर आप साहस से चलते हैं, तो कोई भी रास्ता मुश्किल नहीं रहता।