बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण की सरगर्मी बढ़ते ही सीमांचल का इलाका राजनीतिक हलचलों का केंद्र बन गया है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM इस बार भी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतर चुकी है। सीमांचल में मुस्लिम और अतिपिछड़े वर्ग की बड़ी आबादी के चलते हर दल की नजर इस इलाके पर टिकी है।
सीमांचल का महत्व और पिछला प्रदर्शन
सीमांचल क्षेत्र में कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया जिले शामिल है जिनमें करीब 24 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां मुस्लिम आबादी 40 से 70 प्रतिशत तक है, जो इस इलाके को चुनावी दृष्टि से निर्णायक बनाती है। 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने इसी क्षेत्र से पांच सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था। उस प्रदर्शन ने महागठबंधन के समीकरण को बुरी तरह प्रभावित किया था और एनडीए को अप्रत्याशित बढ़त मिली थी।
ओवैसी फैक्टर और मुस्लिम वोटों का गणित
इस बार AIMIM लगभग 25 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिनमें से 15 सीटें सिर्फ सीमांचल की हैं। असदुद्दीन ओवैसी के आक्रामक रुख और स्थानीय नेता अख्तरुल इमान की पकड़ के चलते पार्टी को यहां मजबूत चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इससे मुस्लिम वोटों में बंटवारा की संभावना बढ़ गई है, जिससे महागठबंधन को नुकसान और एनडीए को अप्रत्यक्ष लाभ हो सकता है।
महागठबंधन का पारंपरिक गढ़
सीमांचल की सीटें पारंपरिक रूप से महागठबंधन के लिए मजबूत आधार रही हैं। यह क्षेत्र लंबे समय से मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिका रहा है। लेकिन 2020 में ओवैसी की एंट्री ने इस समीकरण को झटका दिया। इस बार कांग्रेस और राजद दोनों ही ओवैसी की चुनौती को रोकने के लिए रणनीति बना रहे हैं।
AIMIM के प्रमुख उम्मीदवार और सीटें
अख्तरुल इमान की अमौर सीट AIMIM के लिए सबसे मजबूत गढ़ मानी जाती है, जहां मुस्लिम मतदाता 70% से अधिक हैं। इसके अलावा कोचाधामन, जोकीहाट, बायसी, और बहादुरगंज जैसी सीटों पर भी एआईएमआईएम का प्रभाव दिख रहा है। जोकीहाट में तस्लीमुद्दीन के बेटों के आमने-सामने आने से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
सीमांचल के अन्य सियासी खिलाड़ी
एनडीए ने इस बार डॉ. दिलीप जायसवाल को बिहार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सीमांचल समीकरण को साधने की कोशिश की है। वे किशनगंज से आते हैं और स्थानीय वैश्य समाज पर उनकी अच्छी पकड़ है। वहीं, पप्पू यादव और उदय सिंह (पप्पू सिंह) भी इस क्षेत्र में मजबूत सियासी उपस्थिति रखते हैं। पप्पू यादव की लोकप्रियता यादव-मुस्लिम वोटों में असर डाल सकती है, जबकि उदय सिंह की जन सुराज पार्टी भी सवर्ण वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश में है।
नतीजा
बिहार विधानसभा चुनाव का सबसे रोमांचक मुकाबला इस बार सीमांचल की धरती पर देखने को मिलेगा। ओवैसी की एआईएमआईएम, महागठबंधन और एनडीए- तीनों ही गठबंधन अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं। मुस्लिम वोटों का रुझान इस बार सत्ता की चाबी तय करेगा। अगर मुस्लिम मत एकजुट हुए तो महागठबंधन को फायदा हो सकता है, लेकिन बिखराव की स्थिति में एनडीए की राह आसान बन सकती है।