नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संदर्भ पर 10 दिनों तक चली दलीलों के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इस मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या कोई संवैधानिक अदालत राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति की सहमति देने के लिए समय-सीमा तय कर सकती है।
संविधान पीठ, जिनकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई कर रहे थे और न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर सदस्य थे, ने 19 अगस्त को इस संदर्भ पर सुनवाई शुरू की थी। सुनवाई पूरी होने के बाद पीठ ने मामले को फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया।
अधिकारियों के अनुसार, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलें पूरी कीं, जबकि विपक्षी शासित राज्यों—तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश—ने इसका विरोध किया।
राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से क्या जानना चाहा था?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय से यह जानना चाहा कि क्या राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति की ओर से विवेकाधिकार का प्रयोग करने के लिए न्यायालय समय-सीमा निर्धारित कर सकती है। राष्ट्रपति ने 5 पेज के एक संदर्भ पत्र में सर्वोच्च न्यायालय से कुल 14 प्रश्न पूछे थे। इन प्रश्नों का मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों का उपयोग कैसे किया जाए और क्या न्यायालय इस पर नियंत्रण रख सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह सवाल विशेष रूप से उन परिस्थितियों में उठा जब राज्यपाल या राष्ट्रपति किसी विधेयक पर लंबे समय तक निर्णय नहीं लेते। इस संदर्भ में तमिलनाडु की ओर से पारित विधेयकों पर विचार करते समय राज्यपाल की शक्तियों की सीमा और शीर्ष अदालत के 8 अप्रैल के फैसले के बाद उठे सवाल अहम बन गए।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और दलीलों का सार
सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति के संदर्भ पर कुल 10 दिन तक दलीलें चलीं।
केंद्र की दलील: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के विवेकाधिकार पर न्यायिक आदेशों द्वारा समय-सीमा निर्धारित करना संवैधानिक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला संघीय ढांचे और संवैधानिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
विपक्षी राज्यों की दलील: तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश ने इस संदर्भ का विरोध किया। उनका कहना था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों पर न्यायालय के नियंत्रण से राज्य की स्वायत्तता प्रभावित होगी और यह संघीय संरचना के खिलाफ होगा।
अटॉर्नी जनरल की भूमिका: देश के सर्वोच्च विधि अधिकारी, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अपने पक्ष में दलील दी कि संविधान में स्पष्ट रूप से विवेकाधिकार और समय-सीमा का अंतर नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय केवल सामान्य मार्गदर्शन दे सकता है, लेकिन सीधे तौर पर समय-सीमा निर्धारित करना संवैधानिक नहीं है।
संदर्भ के पीछे का राजनीतिक और संवैधानिक महत्व
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल न्यायिक सवाल नहीं है, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तियों के संतुलन से जुड़ा है।
तमिलनाडु मामला: सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के फैसले के बाद तमिलनाडु में राज्यपाल की भूमिका पर उठे सवालों ने इस संदर्भ को और अहम बना दिया। इस फैसले में राज्यपाल द्वारा विधेयक पर निर्णय में विलंब के विषय में चर्चा हुई थी।
संवैधानिक दृष्टिकोण: अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को कुछ विशेष परिस्थितियों में अधिकार देता है कि वे विधेयकों को अस्वीकार कर सकते हैं या उन्हें संशोधन के लिए वापस भेज सकते हैं। राष्ट्रपति के संदर्भ का उद्देश्य यह जानना था कि क्या न्यायालय इस प्रक्रिया में समय-सीमा निर्धारित कर सकती है।
राजनीतिक दृष्टिकोण: यह मामला केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन, संघीयता, और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अगले कदम
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला संविधान की व्याख्या, राज्यों की स्वायत्तता, और राष्ट्रपति-राज्यपाल के विवेकाधिकार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।