उत्तराखंड के भूस्खलन बांध: नया खतरा नहीं, पुरानी चिंता

उत्तराखंड: पहाड़ों में छुपा पानी का खतरा

Vin News Network
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भूस्खलन बांध – समय से पहले चेतावनी जरूरी
Highlights
  • 1893 का गोहना ताल टूटा तो हरिद्वार तक आई बाढ़
  • हाल में स्यानाचट्टी और धराली में झीलें बनीं, खतरा बरकरार
  • जलवायु परिवर्तन और विकास परियोजनाओं ने जोखिम और बढ़ाया

उत्तराखंड, जहां हरियाली और हिमालयी नदियों का संगम है, वहां भूस्खलन और उससे बने अस्थायी बांध कोई नई घटना नहीं हैं। आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों की ताज़ा शोध रिपोर्ट ने एक बार फिर इस पुरानी समस्या को रेखांकित किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन से बनी प्राकृतिक झीलें और बांध गंभीर प्राकृतिक आपदा का रूप ले सकते हैं। यह रिपोर्ट इस साल जनवरी में अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुई, जिसमें उत्तराखंड के पिछले डेढ़ सौ वर्षों के भूस्खलन बांधों का विवरण दिया गया है।

भूस्खलन बांध क्या होते हैं
जब किसी पहाड़ी नदी या गाड-गधेरे में भूस्खलन से भारी मलबा गिरता है, तो वह पानी के प्रवाह को रोककर एक अस्थायी झील बना देता है। यह झील धीरे-धीरे पानी से भरकर अस्थिर हो जाती है और अचानक टूटने पर नीचे बसे क्षेत्रों में भूस्खलन झील विस्फोट बाढ़ (Landslide Lake Outburst Flood) का कारण बनती है। इस तरह की बाढ़ अचानक और अत्यधिक विनाशकारी होती है।

आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट क्या कहती है
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक श्रीकृष्ण शिवा सुब्रहम्णयम और शिवानी जोशी ने उत्तराखंड में भूस्खलन बांधों के पैटर्न, उनकी आवृत्ति और प्रभावों का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि – संकरी घाटियां, कमजोर चट्टानें, भूकंपीय सक्रियता, और बढ़ती मानसूनी बारिश मिलकर राज्य को भूस्खलन और उससे बने बांधों के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं। रिपोर्ट में अलकनंदा घाटी और चमोली जिले को सबसे अधिक संवेदनशील बताया गया है। यही वह क्षेत्र है जहां 1893 में गोहना ताल बना था, जो 76 साल बाद 1970 में टूटने से हरिद्वार तक बाढ़ आई।

स्यानाचट्टी और धराली
रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में उत्तरकाशी के स्यानाचट्टी और धराली क्षेत्रों में भूस्खलन से बनी झीलों के कारण स्थानीय लोग खतरे में हैं। इन घटनाओं ने दिखाया है कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित विकास इस समस्या को और बढ़ा रहे हैं।

1857 से 2018 तक की घटनाओं का विवरण
रिपोर्ट में 1857 से 2018 तक उत्तराखंड में बने प्रमुख भूस्खलन बांधों की सूची दी गई है। मुख्य बिंदु:

  • अगस्त महीने में सबसे ज्यादा घटनाएं (मानसून पीक)
  • 28% घटनाएं मलबे के भूस्खलन से
  • 24% पत्थर गिरने से
  • 20% मलबे के बहाव से
  • ज्यादातर घटनाएं चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों में हुईं।

कुछ प्रमुख घटनाएं –

  • 1857 मंदाकिनी – 3 दिन में टूटा
  • 1893 अलकनंदा – चट्टान गिरने से, 1894 में पहली बार टूटा और 1970 में दोबारा
  • 1957 धौलीगंगा – हिमस्खलन से मलबे से भर गया
  • 1998 मंदाकिनी – मलबा बहाव
  • 2018 बावरा गाड (पिंडर सहायक) – अभी भी बांधित

भू-आकृतिक और पुरातात्विक अध्ययन
वैज्ञानिकों ने ऑप्टिकल स्टिम्युलेटेड ल्यूमिनेसेंस (OSL) तकनीक, पराग विश्लेषण, चुंबकीय गुण और रासायनिक परीक्षणों के जरिए यह पता लगाया कि अलकनंदा और धौलीगंगा घाटियों में 5,000 से 14,000 साल पहले कई पुरानी भूस्खलन झीलें बनी थीं। इसका मतलब है कि यह समस्या हिमालय के भूगर्भीय इतिहास में गहरी जड़ें रखती है।

जलवायु परिवर्तन और विकास परियोजनाओं से बढ़ता खतरा
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण – वर्षा की तीव्रता, बादल फटने की घटनाएं, और बेमौसमी बारिश, बढ़ रही हैं। इसका असर भूस्खलनों में तेजी के रूप में दिख रहा है। राज्य में सड़कों, सुरंगों और जल विद्युत परियोजनाओं का विकास भी संवेदनशील ढलानों पर दबाव डाल रहा है, जिससे आपदा का खतरा और बढ़ गया है।

सरकारी और सामाजिक तैयारी क्यों ज़रूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन से बने बांधों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग होनी चाहिए।

  • ड्रोन और सैटेलाइट से झीलों की निगरानी
  • संवेदनशील क्षेत्रों में शुरुआती चेतावनी प्रणाली
  • और स्थानीय समुदायों को जागरूक करना
  • इन उपायों से नुकसान कम किया जा सकता है।

उत्तराखंड के भूस्खलन बांध कोई नई आपदा नहीं हैं। यह हिमालय की प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित विकास ने इस खतरे को कहीं अधिक गंभीर बना दिया है। आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट समय रहते चेतावनी देती है कि अगर इन अस्थायी बांधों और झीलों पर समय पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में गोहना ताल जैसी तबाही बार-बार देखने को मिल सकती है।

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