पिथौरागढ़। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के नैनीसैनी पट्टी स्थित देवत गांव में रविवार देर रात उस समय अफरातफरी मच गई, जब अचानक पहाड़ से पत्थरों की बारिश शुरू हो गई। भय और दहशत के बीच ग्रामीणों को अपने घर छोड़ने पड़े। लगभग 50 परिवारों ने रात नैनीसैनी स्थित बारातघर में शरण लेकर बिताई।
भय का कारण – हाल की त्रासदी अभी ताज़ा
देवत गांव के लोगों के मन में डर इसलिए और भी गहरा बैठा है क्योंकि कुछ ही दिन पहले पहाड़ से गिरे एक विशाल पत्थर ने एक मकान को क्षतिग्रस्त कर दिया था। उस हादसे में एक मासूम बालक की मौत हो गई थी, जबकि चार अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। यह घटना आज भी ग्रामीणों की आँखों में खौफ का साया बनाए हुए है।
तीन—चार वर्षों में कई हादसे
ग्रामीणों के अनुसार, बीते तीन–चार वर्षों के दौरान इस गांव में पहाड़ से पत्थर गिरने की कम से कम चार बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। पहाड़ की चोटी से लेकर गांव तक अनगिनत ढीले पत्थर मौजूद हैं। बारिश या मौसम के बिगड़ते ही ये खिसककर गांव तक पहुँच जाते हैं और लोगों की जान–माल के लिए खतरा बन जाते हैं।
रविवार की रात डर और दहशत में बीती
रविवार की देर रात पिथौरागढ़ क्षेत्र में मौसम बेहद खराब हो गया। तेज़ बारिश, बादलों की गरज और बिजली की चमक ने माहौल को और भी भयावह बना दिया। इसी बीच पहाड़ की तरफ से अचानक पत्थर गिरने लगे। पत्थरों के टकराने और गिरने की आवाज़ ने पूरे गांव को दहला दिया। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी घबराकर घरों से बाहर निकल आए।
50 परिवारों का पलायन, बारातघर बना शरणस्थल
लगभग 50 परिवारों ने रातों–रात अपने घर छोड़ दिए। अंधेरे और तेज़ बारिश के बीच ग्रामीण नैनीसैनी पहुँचे और बारातघर में शरण ली। कई परिवारों ने बताया कि उनके मन में यह डर बैठ गया था कि कहीं फिर से कोई बड़ा पत्थर घर पर गिर न जाए और अनहोनी न हो जाए। इस भय ने पूरे गांव को बेघर बना दिया।
प्रशासन और जनप्रतिनिधि पहुंचे मौके पर
सोमवार सुबह दर्जा राज्यमंत्री गणेश भंडारी, जिलाधिकारी विनोद गोस्वामी, भाजपा जिलाध्यक्ष गिरीश जोशी सहित प्रशासनिक टीम देवत गांव पहुँची। अधिकारियों ने ग्रामीणों से मुलाकात की और हालात का जायज़ा लिया। डीएम ने कहा कि ग्रामीणों की सुरक्षा सर्वोपरि है। यदि ज़रूरी हुआ तो लोगों को सुरक्षित स्थानों पर अस्थायी पुनर्वास की व्यवस्था की जाएगी।
ग्रामीणों की पीड़ा
देवत गांव के लोगों का कहना है कि हर बारिश के मौसम में उनका जीना दूभर हो जाता है। बच्चे डर के कारण स्कूल जाने से कतराने लगते हैं और महिलाएं हर पल चिंता में रहती हैं कि कहीं पहाड़ से पत्थर गिरकर उनके परिवार को नुकसान न पहुँचा दे। ग्रामीणों ने प्रशासन से स्थायी समाधान की माँग की है।
विशेषज्ञों की राय
भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार, इस क्षेत्र का भूगोल और चट्टानों की स्थिति अस्थिर है। लगातार बारिश और भूकंपीय हलचल के कारण ढीले पत्थर खिसककर नीचे आते हैं। अगर इस पर समय रहते रोकथाम के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले समय में और बड़ी त्रासदी हो सकती है।
प्रशासन की चुनौतियाँ
स्थानीय प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि गांव को सुरक्षित बनाने के लिए स्थायी कदम उठाए जाएँ। संभावित उपायों में पहाड़ी की जाँच, ढीले पत्थरों को हटाना, रिटेनिंग वॉल (सपोर्टिंग दीवार) बनाना और संवेदनशील परिवारों का पुनर्वास शामिल है।
लोगों की उम्मीदें
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार को उनकी सुरक्षा के लिए ठोस योजना बनानी चाहिए। फिलहाल, प्रशासन द्वारा दिए गए भरोसे से लोग थोड़े संतुष्ट दिखे, लेकिन उनके मन का डर कम नहीं हुआ है।