सतना : मध्य प्रदेश के सतना में एक खास खेत है, जिसकी कहानी आपको जरूर चौंका देगी। इस खेत में साल में केवल चार महीने खेती होती है, लेकिन मुनाफा लाखों में होता है। बाकी समय खेत पानी में डूबा रहता हैं। सतना से करीब 55-60 किमी दूर बकिया बंधा में लगभग 5000 हेक्टेयर फैले इस क्षेत्र में आज 1000 से अधिक किसान मौसमी खेती कर रहे हैं।
स्थानीय निवासियों के मुताबिक, तकरीबन 20 साल पहले सेमरिया से आए मंजूर खान नामक किसान ने सबसे पहले इस डूब क्षेत्र में खेती की शुरुआत की थी। पहले उन्होंने लौकी लगाई, फिर तरबूज और खरबूजे। मुनाफे को देखते हुए आसपास के किसानों ने भी इसे अपनाना शुरू किया और आज यह क्षेत्र खरबूजा-तरबूज उत्पादन का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
डैम निर्माण के बाद इस क्षेत्र में साल के 6 महीने पानी भरा रहता है। इससे पहले यहां के लोग पलायन कर गए। सरकार ने उन्हें मुआवजा देकर ज़मीन अपने अधीन ले ली। शेष 6 महीनों में जब पानी उतरता है, तब किसान यहां खेती करते हैं। बकिया बंधा से उगने वाले खरबूजा देश के कई राज्यों में भेजे जाते हैं। इनमें मधुराजा किस्म सबसे अधिक पसंद की जाती है। इसका रेट भी सबसे ज्यादा है। वहीं, अलीशा नामक किस्म सबसे सस्ती मानी जाती है। एक किसान बताया कि इस क्षेत्र में नार्मल, मथुराजा, सफ़ेदा, अलीशा और जिंटेक्स जैसी किस्मों की पारंपरिक ढंग से खेती की जाती है।
खरबूजे की यह फसल जनवरी से मार्च की शुरुआत तक बोई जाती है। 24 अप्रैल के आसपास फल देना शुरू कर देती है। यह फसल लगभग 90 से 100 दिनों की होती है। कंदवा, भोलवार, गोलहटा , बकिया जैसे आसपास गांवों के किसान भी यहां आकर खेती करते हैं। इस वर्ष अत्यधिक बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। किसान ने बताया कि बारिश के कारण उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ और तकरीबन 50% फसल का नुकसान हुआ है।
एक किसान ने बताया कि उन्होंने 1,19,000 रुपये की लागत में खरबूजे की खेती की लेकिन केवल 18,000 रुपये की ही बिक्री हो सकी। इससे इस वर्ष किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। हालांकि, इस साल का अनुभव कड़वा रहा फिर भी किसान मानते हैं कि यह क्षेत्र अभी भी बड़ी संभावनाएं समेटे हुए है। अगर मौसम साथ दे और सरकारी मदद मिले तो यह क्षेत्र देश के सबसे बड़े खरबूजा-तरबूज उत्पादक क्षेत्रों में अपनी पहचान और मजबूत कर सकता है।