देश के पांच प्रमुख राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर और संभवतः उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव इस साल ही कराए जाने की चर्चा तेज हो गई है। जनगणना के दूसरे चरण और चुनावी तैयारियों के बीच टकराव की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार इन राज्यों में निर्धारित समय से पहले चुनाव कराने पर विचार कर रही है।
सूत्रों के मुताबिक, फरवरी में प्रस्तावित जनगणना के दूसरे चरण के लिए बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों की जरूरत होगी, जो चुनावी ड्यूटी के साथ टकराव पैदा कर सकती है। इसी वजह से नवंबर-दिसंबर के बीच चुनाव कराए जाने की संभावना पर मंथन चल रहा है।
बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में लगभग 5.5 लाख, जबकि उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में करीब 50-50 हजार और पंजाब में लगभग दो लाख सरकारी कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। ऐसे में एक साथ चुनाव और जनगणना दोनों प्रक्रियाओं का संचालन चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
चुनाव आयोग के सूत्रों ने हालांकि यह स्पष्ट किया है कि अभी तक सरकार की ओर से औपचारिक रूप से जल्दी चुनाव कराने को लेकर कोई सूचना नहीं मिली है। लेकिन यह भी कहा गया है कि यदि नवंबर में चुनाव होते हैं तो मतदाता सूची को लेकर कोई बड़ी बाधा नहीं होगी, क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
भाजपा की तीन राज्य इकाइयों—उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब—ने भी समय से पहले चुनाव की तैयारियों की पुष्टि की है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व ने बूथ स्तर की कमेटियों को मजबूत करने और संगठनात्मक तैयारियों को जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरा करने के निर्देश दिए हैं।
उत्तराखंड को लेकर अलग स्थिति बताई जा रही है, जहां पहाड़ी क्षेत्रों में जनगणना का दूसरा चरण सितंबर में पूरा होने की संभावना है। ऐसे में इस राज्य को समय से पहले चुनाव से छूट मिल सकती है। उधर, इस संभावित फैसले को लेकर विपक्षी दलों में भी हलचल तेज हो गई है। हाल ही में हुई इंडिया ब्लॉक की बैठक में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच इस मुद्दे पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई है।