केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू हो गई है. मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले से जुड़े संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है. केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि हर धर्म के भीतर अपनी एक आंतरिक विविधता और बहुलता होती है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए.
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने हिंदू धर्म की व्यापकता को समझाने के लिए ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद समेत पुराणों और रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों का जिक्र किया. उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू धर्म केवल एक जीवन शैली ही नहीं, बल्कि संवैधानिक दृष्टि से एक धर्म है जिसमें कई संप्रदाय और उप-संप्रदाय शामिल हैं. उन्होंने कहा कि सबरीमाला में भगवान अयप्पा के भक्त एक अलग संप्रदाय की तरह हैं और उन्हें अनुच्छेद 25 के तहत अपनी धार्मिक प्रथाएं तय करने का अधिकार है.
बहस के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और तुषार मेहता के बीच अनुच्छेद 17 यानी छुआछूत के उन्मूलन को लेकर तीखी चर्चा हुई. तुषार मेहता ने इस बात पर आपत्ति जताई कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक को छुआछूत की श्रेणी में रखा जा रहा है. इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सवाल किया कि मासिक धर्म के आधार पर किसी महिला के साथ होने वाले व्यवहार को अनुच्छेद 17 से अलग कैसे देखा जा सकता है. हालांकि, तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल मासिक धर्म का नहीं बल्कि एक विशेष आयु वर्ग की परंपरा का है.
अदालत इस मामले में केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित प्रथाओं जैसे अन्य धार्मिक मुद्दों पर भी समीक्षा करेगी. मुख्य न्यायाधीश ने सभी पक्षों को समयसीमा का पालन करने के निर्देश दिए हैं क्योंकि इस फैसले का असर आने वाले कई दशकों तक देश की व्यवस्था पर पड़ेगा.