प्रयागराज में शंकराचार्य और शिष्य पर POCSO केस: कोर्ट के आदेश पर FIR आरोप-प्रत्यारोप तेज

Vin News Network
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POCSO कोर्ट के आदेश के बाद प्रयागराज में शंकराचार्य से जुड़े मामले ने पकड़ा तूल, पुलिस कर रही जांच

प्रयागराज में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य प्रत्यक्चैतन्य मुकुंदानंद गिरि के खिलाफ झूंसी थाने में POCSO एक्ट के तहत FIR दर्ज की गई है। यह कार्रवाई प्रयागराज की विशेष POCSO कोर्ट के आदेश पर की गई, जिसमें नाबालिग बटुकों के कथित यौन शोषण के आरोपों की जांच का निर्देश दिया गया। पुलिस का कहना है कि आगे की कानूनी कार्रवाई विवेचना रिपोर्ट के आधार पर होगी। मामले की शुरुआत शाकुंभरी पीठाधीश्वर आशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा अदालत में दाखिल अर्जी से हुई, जिसमें आरोप लगाया गया कि संबंधित आश्रम और गुरुकुल में शिक्षा व सेवा के नाम पर नाबालिगों के साथ कई बार यौन उत्पीड़न किया गया। याचिका में साक्ष्य के रूप में एक CD भी पेश करने और नाबालिगों के बयान वीडियोग्राफी के साथ दर्ज कराने का उल्लेख किया गया। अदालत ने पुलिस रिपोर्ट पर विचार करने के बाद FIR दर्ज करने का आदेश दिया।

दूसरी ओर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि सच सामने आएगा और उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उन्होंने आरोप लगाने वाले पक्ष पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता का आपराधिक इतिहास रहा है और उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी तरह का दबाव नहीं डालेंगे और कानूनी प्रक्रिया का सामना करेंगे। शंकराचार्य पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता पीएन मिश्रा ने अदालत में 104 पन्नों का हलफनामा दाखिल कर आरोपों को झूठा बताया और POCSO एक्ट की धारा 22 व 23 के तहत कार्रवाई की मांग की, जिसमें झूठा मुकदमा दर्ज कराने और पीड़ितों की पहचान उजागर करने पर दंड का प्रावधान है। बचाव पक्ष का दावा है कि बच्चों को प्रभावित कर बयान दिलाए गए हैं।

उधर आशुतोष ब्रह्मचारी का कहना है कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है और वे प्रयागराज से वाराणसी तक पदयात्रा निकालकर मामले को सार्वजनिक करेंगे। उन्होंने प्रशासन पर पहले कार्रवाई न करने का आरोप भी लगाया। इस विवाद में अब तक कई अलग-अलग वाद दायर किए जा चुके हैं, जिनमें मानहानि और अन्य शिकायतें शामिल हैं। फिलहाल मामला न्यायालय में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 13 मार्च को निर्धारित है। जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की सत्यता स्पष्ट हो सकेगी जबकि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं।

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