देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने बाबर के नाम पर मस्जिद या धार्मिक इमारतों के निर्माण पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को सुनने से ही इनकार कर दिया है। इस फैसले के साथ ही अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि इस प्रकार की व्यापक और सामान्य प्रकृति की मांगों पर न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होता है।
क्या थी याचिका?
यह याचिका उत्तर प्रदेश के अयोध्या निवासी देवकीनंदन पांडे द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में “बाबरी मस्जिद” नाम से एक इमारत के निर्माण का हवाला देते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की थी।
उन्होंने दावा किया कि बाबर एक विदेशी आक्रमणकारी था और उसके नाम पर धार्मिक स्थलों का निर्माण देश के सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित कर सकता है।
याचिका में केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्ष बनाया गया था।
अदालत से क्या मांगा गया था?
याचिकाकर्ता ने मुख्य रूप से दो बड़ी मांगें रखी थीं:
देश के सभी राज्यों को निर्देश दिया जाए कि वे बाबर, बाबरी या किसी विदेशी आक्रमणकारी के नाम पर मस्जिद या अन्य धार्मिक इमारतों के निर्माण की अनुमति न दें।
राज्यों को यह भी आदेश दिया जाए कि वे इस संबंध में गाइडलाइंस, एडवाइजरी या प्रशासनिक आदेश जारी करें, जिससे ऐसे नामों के उपयोग पर रोक लगाई जा सके।
याचिका का उद्देश्य पूरे देश में इस तरह के निर्माण पर एक समान नीति लागू करवाना था।
सुनवाई और कोर्ट की प्रतिक्रिया
शुक्रवार, 20 फरवरी 2026 को इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने सूचीबद्ध हुई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि बाबर एक विदेशी आक्रांता था और उसके नाम को सम्मान देना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग ऐसे नामों को बढ़ावा देते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और याचिका पर विचार करने से ही इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से इस मामले में दखल देने की आवश्यकता नहीं समझी।
फैसले का महत्व
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि न्यायपालिका आम तौर पर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से बचती है, जहां मांगें व्यापक, नीतिगत और संवेदनशील सामाजिक-धार्मिक मुद्दों से जुड़ी हों।
यह फैसला इस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि धार्मिक स्वतंत्रता, नामकरण और स्थानीय प्रशासनिक फैसलों से जुड़े मुद्दों को सामान्यतः सरकार और संबंधित प्राधिकरणों के दायरे में रखा जाता है।
अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद अब इस मुद्दे पर कोई राष्ट्रीय स्तर की रोक लागू नहीं होगी। इसका मतलब है कि ऐसे मामलों में निर्णय स्थानीय प्रशासन और कानूनों के अनुसार ही लिए जाएंगे।
यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक मुद्दों को लेकर न्यायपालिका बेहद सावधानी बरतती है और केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करती है, जहां स्पष्ट संवैधानिक या कानूनी आधार मौजूद हो।