भारत में हर 7 में से 1 स्ट्रोक मरीज 45 वर्ष से कम उम्र का, हाई ब्लड प्रेशर सबसे बड़ा कारण: ICMR अध्ययन

Vin News Network
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युवाओं में भी तेजी से बढ़ रहा स्ट्रोक का खतरा

भारत में स्ट्रोक अब केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गया है। हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा किए गए एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि देश में हर सात में से एक स्ट्रोक मरीज 45 वर्ष से कम उम्र का है। यह आंकड़ा युवाओं में बढ़ते स्वास्थ्य जोखिमों की ओर गंभीर संकेत देता है।

यह अध्ययन ICMR-राष्ट्रीय रोग सूचना विज्ञान एवं अनुसंधान केंद्र द्वारा किया गया, जिसमें 2020 से 2022 के बीच देशभर के 30 अस्पतालों से लगभग 34,792 स्ट्रोक मामलों का विश्लेषण किया गया। इस शोध के निष्कर्ष इंटरनेशनल जर्नल ऑफ स्ट्रोक में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन के अनुसार, स्ट्रोक के मामलों में पुरुषों की संख्या अधिक पाई गई करीब 64 प्रतिशत मरीज पुरुष थे, जबकि 36.6 प्रतिशत महिलाएं थीं। साथ ही, 70 प्रतिशत से ज्यादा मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से थे, जो स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच की समस्या को भी दर्शाता है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) स्ट्रोक का सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आया है। लगभग 74.5 प्रतिशत मरीजों में हाई ब्लड प्रेशर पाया गया। इसके अलावा, बिना धुएं वाले तंबाकू का सेवन (28.5 प्रतिशत) और मधुमेह (27.3 प्रतिशत) भी प्रमुख जोखिम कारक रहे।

स्ट्रोक के प्रकारों की बात करें तो करीब 60 प्रतिशत मामलों में इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke) पाया गया, जो तब होता है जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह रुक जाता है। इसके अलावा, मरीजों में शुरुआती लक्षणों में सबसे आम था शरीर के किसी हिस्से का काम करना बंद हो जाना (मोटर इम्पेयरमेंट), जो 74.8 प्रतिशत मामलों में देखा गया। इसके बाद बोलने में परेशानी (51.2%), निगलने में दिक्कत (30.4%) और बेहोशी (25.6%) जैसे लक्षण सामने आए।

इस अध्ययन ने स्ट्रोक उपचार से जुड़ी एक बड़ी समस्या को भी उजागर किया समय पर अस्पताल न पहुंचना। केवल 20.1 प्रतिशत मरीज ही लक्षण शुरू होने के 4.5 घंटे के भीतर अस्पताल पहुंच पाए, जबकि करीब 38 प्रतिशत मरीज 24 घंटे के बाद पहुंचे। यह “गोल्डन ऑवर” यानी शुरुआती समय में इलाज की कमी को दर्शाता है, जो मरीज की जान बचाने और विकलांगता को कम करने में बेहद अहम होता है।

उपचार की स्थिति भी चिंताजनक रही। समय पर दी जाने वाली थ्रोम्बोलाइसिस थेरेपी केवल 4.6 प्रतिशत मरीजों को ही मिल पाई, जबकि थ्रोम्बेक्टॉमी जैसी उन्नत प्रक्रिया सिर्फ 0.7 प्रतिशत मामलों में की गई। इससे साफ है कि देश में आधुनिक स्ट्रोक उपचार सुविधाओं की पहुंच अभी भी सीमित है।

तीन महीने के फॉलो-अप में स्थिति और गंभीर दिखी करीब 27.8 प्रतिशत मरीजों की मृत्यु हो गई, जबकि लगभग 30 प्रतिशत मरीजों को गंभीर विकलांगता का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, कुछ मरीजों में दोबारा स्ट्रोक होने के मामले भी सामने आए।

अध्ययन के अनुसार, भारत में स्ट्रोक एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। विकसित देशों की तुलना में यहां स्ट्रोक कम उम्र में होता है और मृत्यु दर भी अधिक है। वैश्विक अध्ययनों के अनुसार, हाई ब्लड प्रेशर, वायु प्रदूषण, धूम्रपान, उच्च कोलेस्ट्रॉल, अधिक नमक का सेवन और मधुमेह इसके प्रमुख कारण हैं।

भारत में स्ट्रोक की दर भी लगातार बढ़ रही है, खासकर निम्न और मध्यम आय वाले वर्गों में। अनुमान के मुताबिक, देश में हर एक लाख लोगों पर 108 से 172 स्ट्रोक के मामले सामने आते हैं। वहीं, मृत्यु दर 18 से 42 प्रतिशत तक बताई गई है।

यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि स्ट्रोक से निपटने के लिए जागरूकता बढ़ाना, समय पर इलाज सुनिश्चित करना और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करना बेहद जरूरी है। खासकर युवाओं को अपनी जीवनशैली और स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि इस गंभीर बीमारी से बचा जा सके।

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