विन न्यूज़ नेटवर्क। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भविष्य में अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर चिंता जताते हुए भारत समेत दूसरे देशों के साथ नए रणनीतिक गठबंधन बनाने की जरूरत पर जोर दिया है। उनका कहना है कि आने वाले वर्षों में अमेरिका में ऐसा राष्ट्रपति सत्ता में आ सकता है, जिसका रवैया इजराइल के प्रति शत्रुतापूर्ण हो।
ऐसे में इजराइल को अपनी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत करने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी। नेतन्याहू की इस टिप्पणी ने पश्चिम एशिया की बदलती कूटनीति और भारत-इजराइल संबंधों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।
अमेरिका में बदल सकता है राजनीतिक समीकरण
नेतन्याहू ने रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति पेश करते हुए कहा कि अगले दो वर्षों में अमेरिका में ऐसा राष्ट्रपति आ सकता है, जो इजराइल के प्रति बेहद नकारात्मक रुख अपनाए। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में इजराइल अमेरिका के साथ अपने संबंधों को कैसे संभालेगा और अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे विकल्पों पर किस तरह काम करेगा।
इजराइली प्रधानमंत्री के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मौजूदा कार्यकाल के बचे हुए समय का इस्तेमाल इजराइल को अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए करना चाहिए। इसके साथ ही भविष्य में अमेरिकी नीतियों में संभावित बदलावों को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक साझेदारियां भी विकसित करनी होंगी।
भारत समेत कई देशों के साथ गठबंधन की तैयारी
नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि इजराइल को केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपने सहयोगियों का दायरा बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह मध्य पूर्व और इसके बाहर कई देशों के साथ नए गठबंधन बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
इस दौरान उन्होंने भारत का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि भारत कोई छोटा देश नहीं है और उसके साथ सहयोग इजराइल के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। नेतन्याहू का यह बयान ऐसे समय आया है, जब क्षेत्रीय संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मतभेदों के बीच इजराइल अपने कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
लैटिन अमेरिका पर भी इजराइल की नजर
नेतन्याहू ने लैटिन अमेरिकी देशों में हो रहे राजनीतिक बदलावों को भी इजराइल के लिए संभावित अवसर बताया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में बदलते समीकरणों के बीच नए साझेदारों के साथ संबंध मजबूत करने की जरूरत है।
उनके अनुसार, इजराइल को ऐसी तकनीकी, रक्षा और रणनीतिक क्षमताएं विकसित करनी चाहिए, जो उसे दूसरे देशों के लिए उपयोगी साझेदार बनाएं। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है और संभावित कूटनीतिक चुनौतियों से निपटने में मदद मिल सकती है।
सुरक्षा नीति के नक्शे में भारत को अहम जगह
अपनी नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति पेश करते समय नेतन्याहू ने ‘मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक गठबंधन’ नाम का एक नक्शा भी दिखाया। इसमें देशों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उनके रणनीतिक संबंधों को दर्शाया गया।
प्रस्तुत नक्शे में नीले रंग से इजराइल के सहयोगियों में संयुक्त अरब अमीरात, भारत, ग्रीस और साइप्रस जैसे देशों को दिखाया गया। हरे रंग का इस्तेमाल मित्रवत या तटस्थ देशों के लिए किया गया, जबकि लाल और गुलाबी रंग से दुश्मन या ईरान के नेतृत्व वाले प्रतिरोधी गठबंधन से जुड़े देशों को दर्शाया गया। इस वर्गीकरण में रूस को भी विरोधी पक्ष में दिखाए जाने की बात सामने आई है।
डेमोक्रेटिक पार्टी से बढ़ती दूरी बनी चिंता
इजराइल के कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ नेताओं और समर्थकों के बीच इजराइल के प्रति समर्थन कमजोर हुआ है। इसके पीछे नेतन्याहू सरकार की नीतियों और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों बराक ओबामा तथा जो बाइडेन के साथ उनके तनावपूर्ण संबंधों को भी एक वजह माना जाता है।
नेतन्याहू ने अतीत में इन मतभेदों को इजराइल के हितों की रक्षा के लिए मजबूत नेतृत्व के तौर पर पेश किया है। हालांकि, बदलते राजनीतिक माहौल में अमेरिका के भीतर इजराइल के समर्थन को लेकर अनिश्चितता उनकी सरकार के लिए चुनौती बन सकती है।
विपक्ष ने सुरक्षा नीति को बताया खोखला
नेतन्याहू के प्रमुख चुनावी प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट ने उनकी सुरक्षा नीति की आलोचना करते हुए इसे गंभीर रणनीतिक योजना के बजाय राजनीतिक कवायद बताया। उनका आरोप है कि सरकार ने देश की सुरक्षा से जुड़े वास्तविक सवालों का ठोस जवाब देने के बजाय नारों पर ज्यादा जोर दिया है।
आइजेनकोट ने युद्ध के विभिन्न मोर्चों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का हवाला देते हुए नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल उठाए। इस तरह इजराइल में आगामी चुनाव से पहले सुरक्षा, विदेश नीति और अमेरिका के साथ संबंध प्रमुख राजनीतिक मुद्दे बनते दिखाई दे रहे हैं।
कुल मिलाकर, नेतन्याहू का बयान संकेत देता है कि इजराइल भविष्य में अमेरिका के साथ अपने संबंधों को बनाए रखते हुए भारत और दूसरे देशों के साथ रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर जोर देना चाहता है। हालांकि, इन प्रस्तावित गठबंधनों का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में कूटनीतिक फैसलों और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।