बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही एनडीए के भीतर विरोधाभास उभर कर सामने आ गया है। भाजपा ने इस बार अपने चुनावी संवाद को “घुसपैठियों” और राज्य में कथित जनसांख्यिकीय परिवर्तन के मुद्दे के इर्द‑गिर्द केंद्रित किया है जबकि उसके सहयोगी दलों में इस रुख के प्रति अनिच्छा दिख रही है। खासकर जेडीयू ने इस एजेंडे से दूरी बनाए रखी है और चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) ने भी अब तक मामूली रुख अपनाया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि यह मतभेद बढ़ता है तो एनडीए की एकता और चुनावी रणनीति पर असर पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री ने हालिया रैलियों में घुसपैठियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का संदेश दिया तो वहीं केंद्रीय नेता‑मंत्री भी वोटर सूची की सफाई और चुनावी जोखिम को लेकर भाजपा के नैरेटिव को समर्थन दे रहे हैं। इसी बीच विपक्षी दलों ने भाजपा के आरोपों को चुनावी रणनीति बताकर उसे निशाना बनाया है। कांग्रेस और अन्य दलों का तर्क है कि मतदाता सूची अपडेट के दौरान घुसपैठ जैसे मामलों की कोई निर्णायक पुष्टि चुनाव आयोग की तरफ से सामने नहीं आई है इसलिए इसे चुनावी ध्रुवीकरण का मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा का यह संदेश सीमांचल के कुछ निर्दिष्ट इलाकों में भावनात्मक प्रभाव छोड़ सकता है, परन्तु इसे समूचे राज्य में समान परिणाम के रूप में दोहराना कठिन होगा, खासकर तब जब उसके प्रमुख सहयोगी इसे स्वीकार नहीं कर रहे। जेडीयू के नेतृत्व का फोकस परंपरागत रूप से विकास‑आधारित राजनीति पर रहा है और पार्टी ने संकेत दिया है कि वह विकास और प्रशासनिक उपलब्धियों को ही चुनावी बहस का मुख्य विषय बनाना पसंद करेगी। लोजपा के नीरवपन को भी राजनीति में अपने हित और गठबंधन समीकरणों के चलते व्याख्यायित किया जा रहा है।
विपक्ष ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह राज्य की विकास‑नाकामी को छुपाने के लिए इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को हवा दे रही है। इसके अलावा कांग्रेस और आरजेडी ने चुनाव आयोग और संबंधित संस्थाओं के हवाले से यह सवाल उठाया है कि वोटर‑लिस्ट सुधार प्रक्रिया में कोई ठोस अनियमितता या विदेशी नागरिकों की पहचान क्यों नहीं हुई। राजनीतिक विमर्श के केंद्र में फिलहाल वोटर‑लिस्ट, SIR अभियान और उससे जुड़ी औपचारिक रिपोर्टे बनी हुई हैं।
कुल मिलाकर बिहार में चल रही इस बहस का असर चुनावी परिदृश्य पर कई तरह से पड़ सकता है यदि सहयोगी दल भाजपा के रुख के साथ नहीं चलते तो गठबंधन की अखंडता पर असर आएगा; वहीं यदि मामला स्थानीय स्तर पर भावनात्मक तीव्रता प्राप्त कर ले तो कुछ क्षेत्रों में भाजपा को लाभ भी मिल सकता है। आने वाले दिनों में गठबंधन दलों की रणनीतियों और चुनावी संदेशों में होने वाले किसी भी बदलाव से ही यह स्पष्ट होगा कि यह खटपट बिहार चुनाव के नतीजे पर कितना बड़ा प्रभाव डालती है।