लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब गांवों की सियासत गर्माने लगी है। आगामी 2026 के पंचायत चुनाव को लेकर सभी प्रमुख दलों ने अपनी तैयारियों का आगाज़ कर दिया है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी अब इस चुनाव में पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने खुद कमान संभाल ली है और पार्टी संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए कैडर कैंप और सदस्यता अभियान शुरू कर दिए गए हैं।
बसपा की रणनीति न केवल पंचायत चुनाव जीतने की है, बल्कि इसके जरिए 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भी मजबूत आधार तैयार करना है। पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों का कहना है कि यह चुनाव बसपा के लिए “मिशन 2027 की नींव” है।
गांव-गांव में बढ़ रहा सदस्यता अभियान
लोकसभा चुनाव 2024 में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद बसपा ने संगठन की समीक्षा करते हुए कैडर कैंपों का आयोजन शुरू किया है। इन कैम्पों में: सैकड़ों की संख्या में ग्रामीणों को पार्टी की सदस्यता दिलाई जा रही है। युवाओं, किसानों, दलितों और पिछड़े वर्गों को विशेष रूप से जोड़ा जा रहा है। पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर संवाद और जागरूकता अभियान चला रहे हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर पोस्टर-पर्चे के माध्यम से भी प्रचार किया जा रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि केवल सदस्यता तक सीमित न रहकर अब इन नए सदस्यों को प्रशिक्षण और जिम्मेदारियां भी दी जा रही हैं, ताकि वे पंचायत स्तर पर पार्टी का चेहरा बन सकें।
पंचायत चुनाव से विधानसभा की जमीन तैयार
बसपा की रणनीति साफ है – पहले पंचायत चुनाव जीतो, फिर उसी आधार पर विधानसभा चुनाव 2027 की बुनियाद रखो। एक वरिष्ठ बसपा नेता ने बताया: “गांव हमारी ताकत रहे हैं, और अब वक्त है कि हम फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटें। पंचायत चुनाव के जरिए हम हर गांव में अपना प्रतिनिधि खड़ा करेंगे।” पार्टी का मानना है कि जब ग्राम प्रधान, बीडीसी, जिला पंचायत सदस्य जैसे स्थानीय निकायों पर बसपा का प्रभाव होगा, तो विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के लिए मजबूत संगठन और कैडर तैयार हो जाएगा।
दलित घटनाओं पर सख्त रूख: मायावती की सक्रियता
पार्टी सुप्रीमो मायावती ने हाल के दिनों में दलितों पर होने वाली घटनाओं को लेकर गंभीर रुख अपनाया है। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल को निर्देश दिया है कि:
पीड़ितों के परिवारों से मुलाकात करें
उन्हें पार्टी की ओर से आर्थिक सहायता और नैतिक समर्थन दें, स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई के लिए दबाव बनाएं यह कदम दलित वोट बैंक को फिर से बसपा के साथ जोड़ने की रणनीति का हिस्सा है। मायावती जानती हैं कि बसपा की सबसे बड़ी ताकत यही वर्ग रहा है, और उसे फिर से पार्टी से जोड़ना जरूरी है।
अन्य दलों से नेताओं की एंट्री जारी
कैडर कैंपों के दौरान न केवल नए कार्यकर्ता जोड़े जा रहे हैं, बल्कि अन्य राजनीतिक दलों से असंतुष्ट नेता भी बसपा में शामिल हो रहे हैं। इनमें:
- ग्राम प्रधान
- बीडीसी सदस्य
- क्षेत्रीय प्रभाव वाले पूर्व प्रत्याशी
यह जोड़-तोड़ बसपा को स्थानीय स्तर पर मजबूती देने का काम कर रही है। पार्टी उन्हें पंचायत चुनाव में टिकट देने पर भी विचार कर रही है।
7 सितंबर को अहम बैठक: रणनीति का ब्लूप्रिंट तैयार होगा
आगामी 7 सितंबर 2025 को मायावती ने सभी प्रदेश पदाधिकारियों और जिलाध्यक्षों की बैठक लखनऊ में बुलाई है। इस बैठक में: पंचायत चुनाव की तैयारियों की समीक्षा की जाएगी, प्रत्याशी चयन की प्राथमिकता और मापदंड पर चर्चा होगी, कांशीराम परिनिर्वाण दिवस (9 अक्टूबर) की तैयारियों पर योजना बनेगी, मामलों और पिछड़े वर्गों के मुद्दों पर भी विशेष रणनीति बनाई जाएगी, सूत्रों के अनुसार, मायावती इस बैठक में मिनी-मैनिफेस्टो या पंचायती एजेंडा भी जारी कर सकती हैं।
क्या कहता है राजनीतिक विश्लेषण?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा का यह कदम पुनरुत्थान की दिशा में एक गंभीर प्रयास है। बीते कुछ चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद पार्टी ने अब जमीनी स्तर पर काम शुरू किया है। पंचायत चुनाव से पार्टी को स्थानीय स्तर पर चेहरा और जनाधार मिलेगा, दलित और पिछड़े वर्गों पर फोकस से पार्टी की पारंपरिक पकड़ फिर से मजबूत हो सकती है, अन्य दलों से आए नेताओं का असर भी स्थानीय समीकरणों में बदलाव ला सकता है हालांकि, सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पार्टी कितनी कुशलता से प्रत्याशी चयन, बूथ स्तर की तैयारी और प्रचार तंत्र को चला पाती है।