महाराष्ट्र के भिवंडी में एक ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। आमतौर पर एक-दूसरे के विरोधी माने जाने वाले Indian National Congress और Bharatiya Janata Party (बीजेपी) ने मेयर चुनाव में साथ आने का फैसला किया है। भिवंडी महानगरपालिका में मेयर पद के लिए बीजेपी उम्मीदवार को कांग्रेस ने समर्थन देने का ऐलान किया है, जो स्थानीय राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित कदम माना जा रहा है।
दरअसल, बीजेपी ने पहले नारायण चौधरी को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया था, लेकिन बाद में रणनीति बदलते हुए स्नेहा पाटील को उम्मीदवार घोषित किया गया। इसके बाद कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से पत्र जारी कर बीजेपी उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला किया। इस कदम को दोनों दलों की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना है।
भिवंडी महानगरपालिका के चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, जिसके चलते मेयर पद के लिए गठबंधन की जरूरत थी। चुनाव परिणामों के अनुसार कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसे 30 सीटें मिली थीं, जबकि बीजेपी को 22 सीटें हासिल हुईं। इसके अलावा Eknath Shinde के नेतृत्व वाली शिवसेना को 12 सीटें मिलीं, वहीं शरद पवार गुट की एनसीपी को भी 12 सीटें प्राप्त हुईं। समाजवादी पार्टी को 6 सीटें और अन्य छोटे दलों व निर्दलीय उम्मीदवारों को कुछ सीटें मिलीं।
ऐसे में किसी भी पार्टी के लिए अकेले मेयर बनाना संभव नहीं था। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण बदले और कांग्रेस व बीजेपी जैसे विरोधी दल एक साथ आ गए। इस गठबंधन ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर ये दोनों दल एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हैं।
इस घटनाक्रम के बाद यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या यह कदम एकनाथ शिंदे को भिवंडी की सत्ता से दूर रखने के लिए उठाया गया है। शिंदे की शिवसेना राज्य में बीजेपी की सहयोगी है और दोनों मिलकर महाराष्ट्र में सरकार चला रहे हैं। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर बीजेपी का कांग्रेस के साथ जाना एक अलग ही संकेत देता है। इसे शिंदे गुट के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नगर निकाय चुनावों में अक्सर विचारधारा से ज्यादा महत्व स्थानीय समीकरणों और सत्ता संतुलन को दिया जाता है। भिवंडी का यह मामला भी उसी का उदाहरण है, जहां विरोधी दलों ने अपने-अपने हितों को साधने के लिए हाथ मिला लिया।