PM की इंटर्नशिप स्कीम: सीखने का सुनहरा मौका या संघर्ष की शुरुआत?

PM Internship Scheme: युवा बना रहे हैं करियर, पर रास्ता आसान नहीं

Vin News Network
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सीखने की उड़ान, लेकिन बिना पंखों के... PMIS में युवाओं की हकीकत
Highlights
  • युवाओं को मिल रहा इंडस्ट्री-फोकस्ड ट्रेनिंग का मौका
  • कई छात्रों को नहीं मिल पा रहा पर्सनल मेंटर
  • स्टाइपेंड ₹5,000 – बड़े शहरों में खर्च के लिए नाकाफी

नई दिल्ली। देश के युवाओं को इंडस्ट्री के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री इंटर्नशिप स्कीम (PMIS) ने अपने पायलट चरण में कई उपलब्धियां दर्ज की हैं। अक्टूबर 2024 में शुरू हुई यह योजना अब तक लाखों युवाओं तक पहुंच चुकी है। इस स्कीम का लक्ष्य पांच वर्षों में देश की टॉप 500 कंपनियों में 1 करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप देना है।

हालांकि यह योजना सीखने और अवसरों की दृष्टि से सराहनीय है, लेकिन इसके साथ-साथ कई जमीनी चुनौतियां और व्यावहारिक समस्याएं भी सामने आई हैं। आइए समझते हैं इस स्कीम की स्थिति युवाओं, सरकार और कंपनियों की नज़र से।

युवाओं की बदलती कहानियां: सपना और संघर्ष साथ-साथ
यश के पास न लैपटॉप था, न कोडिंग का कोई संस्थागत प्रशिक्षण। मोबाइल से यूट्यूब देखकर उन्होंने कोडिंग सीखी और PMIS के लिए आवेदन किया। इस स्कीम से उन्हें ना केवल लैपटॉप मिला बल्कि पुणे की एक टेक कंपनी में क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा इंजीनियरिंग जैसे जटिल विषयों पर काम करने का अवसर भी मिला।

चुनौतियों की लंबी सूची
मेंटरशिप की कमी
कुछ इंटर्न्स को बेहतरीन मार्गदर्शन मिला, जबकि आगरा की आकृति सक्सेना जैसी छात्राएं शिकायत करती हैं कि यदि उन्हें पर्सनल मेंटर मिलता, तो सीखने का अनुभव कहीं बेहतर होता।

स्टाइपेंड – बड़ा मुद्दा
₹5,000 महीने का स्टाइपेंड बड़े शहरों में रेंट, खाना और ट्रांसपोर्ट के लिए बेहद कम साबित हो रहा है। कुछ कंपनियां अपनी तरफ से ₹10,000 तक का स्टाइपेंड दे रही हैं, लेकिन यह सभी के लिए उपलब्ध नहीं है।

सामाजिक और पारिवारिक दबाव
कई युवा बताते हैं कि परिवार वालों को यह समझाना मुश्किल होता है कि यह फुल-टाइम नौकरी नहीं है। आर्थिक रूप से परिवार पर बोझ बढ़ता है, जिससे कई बार छात्रों को इंटर्नशिप छोड़नी भी पड़ती है।

जॉइनिंग रेट – चिंता का विषय
पायलट फेज में कंपनियों ने 82,000 इंटर्नशिप ऑफर किए, लेकिन उनमें से केवल 60,000 युवाओं ने ऑफर स्वीकार किया और उनमें से सिर्फ 8,700 ने ही जॉइन किया। यह आंकड़ा बताता है कि स्कीम में स्ट्रक्चर, वित्तीय मदद और पारिवारिक सहयोग जैसे मुद्दों पर और काम करने की ज़रूरत है।

सरकार और इंडस्ट्री की तैयारियां
सरकार का मानना है कि इंटर्नशिप का ढांचा इतना कठोर न हो कि युवा अलग-अलग डिपार्टमेंट्स में जाकर अनुभव न ले सकें। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) और CII (कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री) द्वारा ऑनलाइन सेशन्स के ज़रिए कंपनियों और युवाओं को स्कीम के बारे में जागरूक किया जा रहा है।

शिकायत निवारण और फीडबैक सिस्टम

  • MCA ने इंटर्नशिप पोर्टल पर शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित की है।
  • राज्यों में नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं जो युवाओं के फीडबैक और समस्याएं सुनेंगे।
  • मंत्रालय का कहना है कि इंटर्न्स का अनुभव और प्रतिक्रिया ही स्कीम को भविष्य में दिशा देंगे।

संसदीय समिति की रिपोर्ट
संसदीय वित्त स्थायी समिति ने चिंता जताई है कि स्कीम में पारदर्शिता और निष्पक्षता होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि:

  • योजना की स्वतंत्र समीक्षा समय-समय पर होनी चाहिए
  • स्टाइपेंड बढ़ाने पर पुनर्विचार किया जाए
  • कंपनियों को भी समान स्तर पर जवाबदेह बनाया जाए
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