किशनगंज। बिहार की राजनीति में किशनगंज हमेशा से एक खास जगह रखता आया है। यह जिला राज्य का मुस्लिम बहुल इलाका है और लंबे समय से महागठबंधन का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन इस बार का विधानसभा चुनाव अलग माहौल में होने जा रहा है। महागठबंधन, एनडीए और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम के बीच मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है।
महागठबंधन का परंपरागत दबदबा
किशनगंज जिले में कुल चार विधानसभा सीटें हैं। 2020 के चुनाव में इनमें से दो सीटें महागठबंधन ने जीती थीं, जबकि दो पर एआइएमआइएम ने कब्जा जमाया था। हालांकि बाद में दोनों एआइएमआइएम विधायक राजद में शामिल हो गए, जिससे चारों सीटों पर महागठबंधन का कब्जा हो गया। इस समय स्थिति यह है कि महागठबंधन यहां मजबूत स्थिति में दिखता है। कांग्रेस और राजद दोनों ही अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन एआइएमआइएम के स्वतंत्र चुनाव लड़ने की संभावनाओं ने समीकरण बिगाड़ दिए हैं।
एनडीए की रणनीति और उम्मीदें
एनडीए ने इस बार किशनगंज को अपनी प्राथमिकता में रखा है। भाजपा और जदयू दोनों ही यहां मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की रणनीति बना रहे हैं। एनडीए को उम्मीद है कि अगर एआइएमआइएम ने प्रत्याशी उतारा तो महागठबंधन के वोट बैंक में सेंधमारी होगी, जिसका सीधा फायदा उन्हें मिल सकता है। हाल ही में एनडीए ने ठाकुरगंज के गांधी मैदान में बड़ा कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में स्थानीय और केंद्रीय नेताओं ने कार्यकर्ताओं में जोश भरा और चुनावी हुंकार भरी।
किशनगंज सदर सीट: कांटे की टक्कर
पिछले चुनाव में कांग्रेस के इजहारूल हुसैन ने भाजपा की स्वीटी सिंह को महज 1381 वोटों से हराया था। यह जीत बेहद करीबी थी। एआइएमआइएम के कमरूल होदा यहां तीसरे स्थान पर रहे थे और उन्होंने 41,904 वोट हासिल किए थे।
इस बार एआइएमआइएम का रुख अहम होगा। अगर पार्टी फिर से मैदान में उतरती है, तो कांग्रेस का समीकरण गड़बड़ा सकता है। भाजपा भी इस सीट पर पूरा फोकस किए हुए है।
ठाकुरगंज सीट: कांग्रेस का पुराना गढ़
ठाकुरगंज विधानसभा सीट पर 1952 से ही कांग्रेस का दबदबा रहा है। हालांकि 2020 में राजद के सऊद आलम ने कांग्रेस की जगह लेते हुए जीत हासिल की। उन्होंने स्वतंत्र प्रत्याशी गोपाल कुमार अग्रवाल को करीब 23 हजार वोटों से हराया।
यहां जदयू के नौशाद आलम तीसरे और एआइएमआइएम के महबूब आलम चौथे स्थान पर रहे थे। इस बार एनडीए पूरी ताकत से मैदान में है। खासकर इसलिए क्योंकि पूर्व विधायक गोपाल कुमार अग्रवाल हाल ही में जदयू में शामिल हुए हैं और यहां से अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं।
बहादुरगंज: कांग्रेस का गढ़ लेकिन खतरे में
बहादुरगंज विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। 16 चुनावों में से 10 बार कांग्रेस यहां विजयी रही है। लेकिन 2020 में एआइएमआइएम के मोहम्मद अंजार नईमी ने इस पर कब्जा कर लिया। उन्होंने कांग्रेस के गढ़ को ध्वस्त कर दिया और विजयश्री हासिल की। अब नईमी राजद में शामिल हो चुके हैं और संभावना है कि वे राजद से ही उम्मीदवार बनेंगे। इस बार भी मुकाबला बेहद दिलचस्प होगा।
कोचाधामन: हर बार बदली तस्वीर
कोचाधामन विधानसभा सीट 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। इस सीट पर अब तक हुए तीन चुनावों में हर बार जनता ने नए चेहरे पर भरोसा जताया है। 2010 में राजद के अख्तारुल ईमान ने जदयू के मुजाहिद आलम को हराया था। लेकिन 2014 के उपचुनाव में मुजाहिद आलम जदयू से जीत गए और 2015 में भी विजयी हुए। अब वे राजद में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में एनडीए इस सीट को अपने लिए संभावित अवसर मान रहा है क्योंकि यहां जदयू की पकड़ पहले से है और उम्मीदवार बदलने की संभावना भी ज्यादा है।
एआइएमआइएम का गेम चेंजर रोल
किशनगंज में इस बार एआइएमआइएम का रोल सबसे अहम माना जा रहा है। अगर ओवैसी की पार्टी चुनाव लड़ती है तो मुस्लिम वोटों में बंटवारा होना तय है। यह बंटवारा महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी और एनडीए के लिए मौके की खिड़की साबित हो सकता है।